इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि मुकदमे की सुनवाई के दौरान सामने आए साक्ष्यों के आधार पर फैसला सुनाए जाने से पहले कभी भी आरोप में नई धाराएं जोड़ी जा सकती हैं। पहले इस संबंध में दिया गया आवेदन खारिज हो चुका हो, तब भी अदालत अपनी इस शक्ति का इस्तेमाल कर सकती है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि मुकदमे की सुनवाई के दौरान सामने आए साक्ष्यों के आधार पर फैसला सुनाए जाने से पहले कभी भी आरोप में नई धाराएं जोड़ी जा सकती हैं। पहले इस संबंध में दिया गया आवेदन खारिज हो चुका हो, तब भी अदालत अपनी इस शक्ति का इस्तेमाल कर सकती है।
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न्यायमूर्ति सौरभ श्रीवास्तव की एकल पीठ ने इस टिप्पणी के साथ बस्ती के अपर सत्र न्यायाधीश के आदेश को सही ठहराते हुए आरोपी राघवेंद्र प्रताप सिंह की याचिका खारिज कर दी। मामला गौर थाने में 19 मई 2021 को दर्ज प्राथमिकी से जुड़ा है। शिकायतकर्ता के अनुसार 16 मई 2021 को राजनीतिक रंजिश में आरोपियों ने उसके साथ मारपीट की। आरोप है कि राघवेंद्र प्रताप सिंह ने तमंचे से गोली चलाई। बचाव करने पहुंचे मनोज शर्मा को भी पीटा गया।
पुलिस ने आरोप पत्र दाखिल किया, लेकिन आरोपियों के खिलाफ मारपीट, धमकी व अपमानित करने के आरोप में चार्जशीट दाखिल की। हत्या के प्रयास की धारा-307 इसमें शामिल नहीं थी। शिकायतकर्ता ने इसे जोड़ने के लिए आवेदन दिया, लेकिन आठ सितंबर 2022 को अदालत ने उसे समय से पहले बताते हुए खारिज कर दिया। इसके बाद सुनवाई के दौरान साक्ष्य दर्ज होने पर चार जून 2026 को ट्रायल कोर्ट ने धारा-307 जोड़ने का आदेश दिया। इसे आरोपी ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।