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नॉन नेट फेलोशिप के लिए लंबी लड़ाई की तैयारी

Mon, 26 Oct 2015 01:38 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
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इलाहाबाद (ब्यूरो)। नॉन नेट फेलोशिप बंद करने के विरोध में आंदोलन मुखर होने लगा है। यूजीसी के इस फैसले के विरोध में सभी छात्र संगठन आ गए हैं। इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ अध्यक्ष ऋचा सिंह के नेतृत्व में रविवार को हुई बैठक में संगठित और लंबे आंदोलन की घोषणा की गई। इसके तहत सोमवार को छात्र-छात्राएं कला और विज्ञान संकाय परिसर में जुलूस निकालेंगे। उसके बाद डीएम को ज्ञापन सौंपेंगे। इसके बाद बैठक कर आगे के आंदोलन की घोषणा की जाएगी। दावा किया जा रहा है कि आंदोलन में एबीवीपी, समाजवादी छात्रसभा, एनएसयूआई, आइसा समेत सभी संगठन से जुड़े छात्र-छात्रा शामिल होंगे।
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यूजीसी ने विश्वविद्यालयों की शोध प्रवेश परीक्षा (क्रेट) के तहत पीएचडी / डीफिल कोर्स में दाखिला पाने वाले नॉन नेट, नॉन जेआरएफ शोधार्थियों की फेलोशिप बंद करने की घोषणा की है। इससे छात्र-छात्राओं में गुस्सा है और फैसला वापस लेने की मांग कर रहे हैं। इस मांग को लेकर विद्यार्थियों ने देशव्यापी आंदोलन छेड़ रखा है।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के विद्यार्थी भी अलग-अलग छात्र संगठनों के बैनर तले आंदोलनरत हैं, लेकिन रविवार को छात्रसंघ भवन पर हुई बैठक में मिलकर आंदोलन की घोषणा की गई। इसी के तहत सोमवार को दिन में 11 बजे छात्र-छात्राओं का जमावड़ा होगा। वहां प्रदर्शन और सभा के बाद वे जुलूस निकालेंगे। छात्रों का कहना था कि अभी फेलोशिप आठ हजार से बढ़ाकर 12 हजार रुपये करने की घोषणा की गई थी।
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इसके विपरीत यूजीसी ने पूरी फेलोशिप ही वापस ले ली। यूजीसी के इस फैसले को स्वीकार नहीं किया जाएगा। छात्रसंघ अध्यक्ष ऋचा सिंह का कहना था कि 12 हजार रुपये फेलोशिप के लिए लड़ाई होगी। उन्होंने कहा कि दो-तीन दिनों से यह बताया जा रहा है कि केंद्र सरकार ने यूजीसी के इस फैसले को वापस लेने का आश्वासन दिया है लेकिन यह सब आंदोलन तोड़ने की साजिश है। जब तक फेलोशिप बंद करने का फैसला वापस नहीं लिया जाता उनका आंदोलन जारी रहेगा।

नॉन नेट फेलोशिप बंद करने के विरोध में शिक्षक भी हैं। शिक्षकों के अनुसार यूजीसी के इस फैसले से शोध कार्यक्रमों तथा उनकी गुणवत्ता पर प्रभाव बनने की आशंका भी बन गई है। इतना ही नहीं पीएचडी में दाखिला के लिए विश्वविद्यालयों के स्तर पर होने वाली प्रवेश परीक्षा (क्र्रेट) पर भी बुरा असर पड़ने की आशंका है। शिक्षकाें का कहना है कि रिसर्च में कई तरह के खर्च होते हैं। खासतौर पर राज्य विश्वविद्यालयों में इनके लिए बजट नहीं होता। इसकी कमी फेलोशिप तथा शोध कार्य के लिए मिलने वाली राशि से पूरी की जाती है।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रोफेसर बेचन शर्मा का कहना है कि ऐसे में फेलोशिप बंद होने पर रिसर्च कार्य पर बुरा प्रभाव पड़ेगा। उन्होंने बताया कि उत्तर प्रदेश के राज्य विश्वविद्यालय के डीफिल कोर्स में प्रवेश के लिए प्रदेश स्तर पर पात्रता परीक्षा कराई गई थी लेकिन इन्हीं वजहोें से कई विश्वविद्यालयों ने उसके माध्यम से दाखिला लेने से मना कर दिया था। अंत में उस परीक्षा का कोई मतलब नहीं रह गया। यही स्थिति क्रेट के साथ भी हो सकती है। शिक्षकों का यह भी कहना है कि मेधावियों में शोध के प्रति पहले से रुचि कम है। इस तरह के फैसले से स्थिति और बिगड़ेगी।
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