शहर उत्तरी में राजकीय आस्थान की जमीन पर बसी लाखों की आबादी के उजड़ने का खतरा बढ़ गया है। पिछले दिनों प्रशासन ने प्रशासन ने जिस तरह से पक्के मकानों पर बुलडोजर चलवाया, उसे देखने के बाद राजकीय आस्थान की भूमि (स्टैंड लैंड) पर बसे लाखों परिवार सहमे हुए हैं। अब सबको फ्रीहोल्ड की प्रस्तावित नीति लागू होने का इंतजार है। हालांकि यह नीति राजस्व परिषद में अटकी हुई है। काफी समय बीतने के बाद भी शासन इस पर कोई निर्णय नहीं ले सका है।
शहर उत्तरी में बघाड़ा, छोटा बघाड़ा, सलोरी, बेली सहित तमाम इलाकों में राजकीय आस्थान की जमीन पर लाखों की आबादी बसी हुई है। राजकीय आस्था की भूमि को फ्रीहोल्ड किए जाने का कोई प्रावधान नहीं है, सो ये आबादी सरकारी दस्तावेजों में अवैध कब्जेदार के रूप में दर्ज है। ऐसे लोगों को प्रशासन की ओर से कई बार नोटिस जारी किया चुका है कि खुद ही मौके से चले जाएं, वरना प्रशासन वहां बुलडोजर चलवा देगा। कुछ दिनों पहले जब बघाड़ा में जब पक्के मकानों पर बुलडोजर चलवाया गया तो अन्य इलाकों में भी हड़कंप मच गया।
दूसरी ओर राजकीय आस्थान की भूमि को नजूल की तरह फ्रीहोल्ड किए जाने का प्रस्ताव वर्षों से राजस्व परिषद में अटका हुआ है। अगर यह योजना लागू होती तो बघाड़ा में लोगों को अपने घरों से हाथ न गंवाना पड़ा। हालांकि कार्रवाई के बाद विधायक अनुग्रह नारायण सिंह ने कमिश्नर से मिलकर फ्रीहोल्ड की प्रस्तावित नीति पर बात करते हुए कार्रवाई रोकने की मांग की तो इस पर सहमति बन गई।
अब सबको फ्रीहोल्ड की प्रस्तावित नीति लागू होने का इंतजार है ताकि राजकीय आस्थान की भूमि पर बसी आबादी फ्रीहोल्ड के जरिए सरकारी दस्तावेजों को खुद को वैध कब्जेदार घोषित करा सके। पिछले दिनों इलाहाबाद आए राजस्व परिषद के आयुक्त ने आश्वस्त किया था कि एक हफ्ते के भीतर नीति को अंतिम रूप देकर प्रस्ताव शासन के पास भेज दिया जाएगा ताकि कैबिनेट से उसे हरी झंडी मिल सके। फिलहाल फ्रीहोल्ड नीति का प्रस्ताव अब भी फाइलों के ढेर में दबा हुआ है और राजकीय आस्थान की भूमि पर बसी लाखों की आबादी पर उजड़ने का खतरा मंडरा रहा है।