दिल्ली-नोएडा-दिल्ली फ्लाईओवर पर टोल टैक्स की वसूली को लेकर हाईकोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा है कि नोएडा और टोल कंपनी के अधिकारी मर्सिडीज वालों को छोड़कर स्कूटर पर चलने वालों को भी देख लिया करें। कोर्ट का कहना है कि उनको नोएडा अथॉरिटी या टोल कंपनी से मतलब नहीं है, उनको आम आदमी से मतलब है। आम आदमी को अब बख्श दिया जाए। वसूली का मामला नोएडा अथॉरिटी और टोल कंपनी आपस में तय करें तो बेहतर होगा। यदि सहमत हों तो कोर्ट यह छूट दे देगी कि टोल कंपनी नोएडा अथॉरिटी से अपना बकाया वसूल करे। हालांकि अदालत ने इस संबंध में कोई आदेश नहीं दिया है, मगर बृहस्पतिवार को मामले की सुनवाई के दौरान मौखिक टिप्पणी करते हुए यह बातें कहीं।
नोएडा रेजीडेंट वेलफेयर एसोसिएशन की जनहित याचिका पर न्यायमूर्ति अरुण टंडन और न्यायमूर्ति सुनीता अग्रवाल की खंडपीठ सुनवाई कर रही है। पीठ ने टोल कंपनी से पूछा है कि क्या बिना विज्ञापन जारी किए वसूली का ठेका दिया जा सकता है। संविदा की गलत शर्तोें का फायदा उठाकर लागत से कई गुना अधिक टोल की वसूली कैसे जारी रखी जा सकती है। फ्लाई ओवर बनाने का खर्च 407 करोड़ से बढ़कर पांच हजार करोड़ रुपये हो चुका है।
इस तरह से वसूली होती रही तो अगले सौ सालों में भी लागत वसूल नहीं हो पाएगी। कंपनी के अधिवक्ता का कहना था कि नोएडा अथॉरिटी से 30 वर्ष का करार हुआ है। यदि तीस वर्ष तक उनको वसूली की इजाजत दी जाए तो कंपनी तीस साल बाद फ्लाई ओवर नोएडा को सौंप कर अलग हो जाएगी, मगर अदालत इस पर सहमत नहीं थी। पीठ ने कहा कि जब लागत वसूल हो चुकी तो फिर जनता से वसूली जारी रखने का कोई औचित्य नहीं है। कंपनी गलत करार करने केलिए नोएडा अथॉरिटी के खिलाफ वैधानिक कार्रवाई करे, मगर आम लोगों से वसूली न करे। याचिका पर शुक्रवार को भी सुनवाई होगी।