एंटीबॉयोटिक दवाओं की तरह अब एंटी फंगल दवाएं भी बेअसर साबित हो रही हैं। बाजार में कई नई दवाएं आई हैं लेकिन ये चर्मरोगों के इलाज में बहुत प्रभावी साबित नहीं हुई हैं। लोगों में फंगल संक्रमण बार-बार हो रहे हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक यह समस्या जीवाणुओं की जीन संरचना मजबूत होने से पैदा हुई है। इससे त्वचा रोग चिकित्सकों के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो गई हैं।
विशेषज्ञ बताते हैं कि आमतौर पर फंगल इंफेक्शन वाली बीमारियां बारिश में हुआ करती थीं लेकिन अब ठंड के दिनों में भी लोग इससे परेशान होते हैं। दाद, खुजली, चकत्ते पड़ने पर इस्तेमाल की जाने वाली पुरानी दवाएं ठीक से काम नहीं कर रही हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक प्रदूषण, बदलती जीवन शैली व दवाओं के बार-बार और ज्यादा मात्रा में इस्तेमाल से जीवाणुओं - कीटाणुओं की जेनेटिक संरचना और मजबूत हुई है। कीटाणुओं द्वारा लगातार अपने जीन में बदलाव करने से भी समस्या पैदा हुई है। फंगल इंफेक्शन के इलाज के लिए बाजार में कई नई दवाएं भी आई हैं, जो कुछ ही काम कर रही हैं। बीमारियां ठीक न होने के कारण मरीजों को दोे एंटी फंगल इंजेक्शन तक देना पड़ रहा है। लेकिन इसके दूरगामी परिणाम ठीक नहीं बताए जा रहे हैं क्योंकि सभी एंटी फंगल दवाएं एंजाइम का स्तर प्रभावित करती हैं।
स्वास्थ्य प्रभावित कर सकता है अधिक डोज
डॉक्टर मरीजों के संतोष के लिए दवाओं की संख्या, डोज और अवधि बढ़ा रहे हैं लेकिन इससे मरीज का स्वास्थ्य प्रभावित हो सकता है। कुछ जागरूकता आई है जिससे अमेरिका, यूरोप के देशों से आ रही एंटी फंगल दवाओं के इस्तेमाल से डॉक्टर बच रहे हैं। चूंकि दूसरे देशों की दवाएं वहां के परिवेश के मुताबिक होने वाली परेशानियों के आधार पर बनती हैं इसलिए इनका भारत में इस्तेमाल घातक साबित हो सकता है। भारतीय परिवेश के लिए ये दवाएं कितनी कारगर होंगी, बिना जांच के तय नहीं हो सकता।