प्रदेश में सरकार बनने के बाद कई जिलों में पंचायत अध्यक्षों और ब्लाक प्रमुखों ने अपनी कुर्सी बचाने के लिए भाजपा का दामन थाम लिया है। ऐसे में शीर्ष नेतृत्व को आशंका रही कि यदि रेखा सिंह के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पारित हो गया तो अन्य स्थानों पर भी इस तरह की गुटबाजी शुरू हो सकती है। इस तरह से दोनों पक्षों में समझौता कराके इन आशंकाओं को खत्म करने की कोशिश की गई है।
इसके अलावा लंबे समय तक यह बहस भी छिड़ी रही कि रेखा सिंह और उनके पति पार्टी में हैं या नहीं। इससे गुटबाजी को और हवा मिल रही थी। जबकि, अशोक सिंह और केशरी देवी पटेल दोनों ही नेताओं की यमुनापार की राजनीति में प्रभावी दखलंदाजी है। केशरी देवी के पुत्र दीपक करछना से विधायक रह चुके हैं तो पूर्व ब्लाक प्रमुख अशोक सिंह की मांडा के अलावा मेजा की सियासत में मजबूत दखल है।
इसलिए क्षेत्र से सांसद डॉ. रीता बहुगुणा जोशी समेत अन्य नेताओं की पूरी कोशिश रही कि इन दोनों नेताओं को एक मंच पर लाकर यमुनापार में पार्टी को मजबूत करने के साथ जातीय समीकरण भी साधा जा सके। इसके अलावा भाजपा को जिले में ठाकुर चेहरे की लंबे समय से तलाश है। अशोक सिंह और रेखा सिंह की इंट्री को पार्टी के इसी रणनीति का हिस्सा के रूप में भी देखा जा रहा है। राजनीतिक पंडितों का कहना है कि अब देखना होगा कि अशोक सिंह और रेखा सिंह ने जिस सहारे को पकड़कर पार्टी में प्रवेश किया है, वह कितना मजबूत होता है।
भविष्य की सियासत पर असमंजस बरकरार
केशरी देवी और रेखा सिंह को एक साथ बैठाकर पार्टी ने फिलहाल तो गतिरोध दूर कर दिया है, लेकिन भविष्य को लेकर अब भी असमंजस बरकरार है। रेखा सिंह का कार्यकाल अब सिर्फ पांच महीने बचा है। यानी, पंचायत के अन्य पदों के साथ अध्यक्ष के लिए भी चुनाव जल्द ही संभावित है। इस बार जिला पंचायत अध्यक्ष पद पर आरक्षण के अंतर्गत बदलाव भी संभावित है। इसलिए इस पद को लेकर सियासत का अंतिम तौर पर पटाक्षेप नहीं हुआ है।