इलाहाबाद (ब्यूरो)। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के नए छात्रसंघ पदाधिकारियों के सामने वर्तमान स्थिति से निपटना सबसे बड़ी चुनौती होगी। नियमित कक्षाएं सुनिश्चित करना तो पहले से ही चुनौती है, शिक्षकों की कमी, उनके बीच की राजनीति तथा प्रशासनिक अराजकता की वजह से भी परिसर में पढ़ाई पूरी तरह से बाधित है। इससे पहले स्थाई कुलपति की जल्द से जल्द नियुक्ति के लिए सरकार पर दबाव बनाने के लिए भी उन्हें आगे आना होगा। चिंताजनक बात यह है कि इस माहौल के पीछे छात्र नेताओं की अराजकता को भी बड़ा कारण माना जा रहा है। ऐसे में पदाधिकारियों के सामने छात्रसंघ की पुरानी गरिमा स्थापित करने तथा छात्र नेताओं पर नियंत्रण की बड़ी चुनौती होगी।
2012 में सात साल बाद छात्रसंघ बहाल हुआ। इस लोकतांत्रिक अधिकार की बहाली में छात्र-छात्राओं का लंबा संघर्ष और बलिदान शामिल है। लाजिमी है, इस छात्रसंघ से विद्यार्थियों को ढेरों उम्मीदें भी रहीं, लेकिन छात्र-छात्राओं को हर स्तर पर निराशा मिली। बातचीत में विद्यार्थियों ने खुलकर अपनी बात भी रखी, जिसमें उनका यह दर्द साफ दिखा। हालांकि उन्होंने उम्मीद जताई कि नए पदाधिकारी पुराने गौरव को आगे बढ़ाने के साथ विश्वविद्यालय हित में नई परंपरा की शुरुआत भी करेंगे। छात्रसंघ से विद्यार्थियों के अलावा कर्मचारियों को भी काफी उम्मीदें हैं। एक कर्मचारी नेता का कहना था कि परिसर में वित्तीय अराजकता की स्थिति है। उन्हें उम्मीद है कि नया छात्रसंघ इस पर अंकुश लगाएगा।