इलाहाबाद। शस्त्र लाइसेंस के 46 साल पुराने एक मुकदमे में अंतिम बचे अभियुक्त दिवाकर को गत माह 30 सितंबर को मुक्ति मिल सकी। कोर्ट ने उसे दोषमुक्त कर दिया। मगर जिला न्यायालय में अभी भी ऐसे हजारों मुकदमे लटके हैं, जिसमें पीड़ित और आरोपी दोनों दशकों की न्याय की बाट जोह रहे हैं। जिला अदालत इलाहाबाद में दस साल पुराने मुकदमों का कुल प्रतिशत 22.51है।
आंकड़ों के लिहाज से देखें यहां कुल लंबित एक लाख 96 हजार 821 मुकदमों में यह संख्या 44302 होती है। इसमें भी क्रिमिनल के 33379 मुकदमे हैं जबकि सिविल के 10923 मुकदमे हैं। नवंबर माह में ऐसे 699 मुकदमों का निस्तारण किया जा सका। जिसमें 377 फौजदारी के और 322 सिविल के केस थे। जाहिर है कि लंबित मुकदमों के लिहाज से निस्तारण की दर धीमी है।
अभियोजन का नहीं मिलता सहयोग
मुकदमों के निस्तारण में देरी की सबसे बड़ी वजह अभियोजन का सहयोग नहीं मिल पाने की बताई जाती है। कई बार मामूली मुकदमों में भी पुलिस गवाहों और साक्ष्यों को पेश करने में दशकों लगा देती है। मुकदमों में लंबी तारीखों की मांग करने से भी निस्तारण पर विपरीत असर पड़ता है जबकि सुप्रीमकोर्ट और हाईकोर्ट से ऐसे तमाम निर्देश हैं कि अनावश्यक रूप से तारीखें न दी जाएं। यहां 12.83 प्रतिशत मुकदमे ऐसे हैं जिनमें तीन माह से अधिक लंबी डेट लगी है।
जजों की कमी से पड़ता है असर
जनपद न्यायालय में मौजूदा जजों की कुल संख्या 55 है जो सिविल और क्रिमिनल के मुकदमों की सुनवाई करते हैं। मानक के लिहाज से यह संख्या काफी कम है। ऐसी स्थिति देश भर की अदालतों में देखी जा सकती है। पूरे देश में 16 हजार से कुछ अधिक जज ही हैं।
कुल लंबित मुकदमों की संख्या
10 साल से पुराने मुकदमे- सिविल-10923 क्रिमिनल- 47640, कुल 44302
पांच से 10 साल पुराने मुकदमे- सिविल- 11492, क्रिमिनल 36148, कुल- 47460
दो से पांच वर्ष पुराने मुकदमे- सिविल- 18576, क्रिमिनल 32227, कुल 50803
दो वर्ष से कम समय से लंबित मुकदमे-सिविल 19763, क्रिमिनल 34313, कुल 54076
कुल लंबित मुकदमे- सिविल 60754, क्रिमिनल 136067 कुल 196821