महाराणा प्रताप और हकीम खां के संबंधों को जन-जन तक पहुंचाने पर जोर
उनका कहना था कि इतिहास के पाठ्यक्रम में महाराणा प्रताप का जीवन एवं संघर्ष प्राथमिक शिक्षा से उच्च शिक्षा तक के पाठ्यक्रम में अनिवार्य रूप से पढ़ाया जाना चाहिए। उनका कहना था कि अगर हम युवा पीढ़ी के हृदय में धार्मिक एवं जातीय भाईचारे का बीज बोना चाहते हैं और धार्मिक एवं जातिगत द्वेष कम करना चाहते हैं तो महाराणा प्रताप के जीवन आदर्श को प्राथमिक शिक्षा में शामिल करना होगा।
साथ ही उच्च शिक्षा के क्षेत्र में और अधिक शोध एवं लेखन को बढ़ावा देना होगा। उन्होंने हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए महाराणा प्रताप और हकीम खान सूर के संबंधों से जन-जन को परिचित कराने पर जोर दिया। बतौर विशिष्ट अतिथि इतिहास के प्रोफेसर डॉ. धीरेंद्र कुमार ने महाराणा प्रताप के जीवन एवं संघर्ष की व्याख्या की। धीरेंद्र ने बताया कि मेवाड़ के राज चिह्न में जहां एक ओर क्षत्रिय प्रतीक को स्थान मिला है, वहीं दूसरी तरफ भील जनजातियों के प्रतीक चिह्न को भी स्थान दिया गया है।
इस दौरान धार्मिक, सामाजिक समरसता को बढ़ावा देने के लिए समाज में उल्लेखनीय योगदान देने वाले लोगों को सम्मानित भी किया गया। इनमें प्रमुख रूप से राजकुमार सिंह चौहान, अरविंद कुमार सिंह, डॉ. समरजीत सुमन शामिल थे। इससे पहले संगोष्ठी का शुभारंभ न्यायमूर्ति मंजू रानी ने मां सरस्वती और महाराणा प्रताप के चित्रों पर माल्यार्पण व दीप प्रज्वलन कर किया। अतिथियों को अंगवस्त्र और प्रतीक चिह्न के तौर पर महाराणा प्रताप की प्रतिमा भेंट की गई।