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Mahakumbh : आईआईटी बांबे से की इंजीनियरिंग की पढ़ाई...दो लाख महीने की नौकरी ठुकराकर बने नागा संन्यासी

Thu, 16 Jan 2025 06:31 AM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, महाकुंभ नगर (प्रयागराज)

सार

अभय सिंह मूलरूप से हरियाणा के रहने वाले हैं। उन्होंने बताया कि वह बांबे आईआईटी से एयरो स्पेस से इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। उन्हें जर्मनी में दो लाख महीने की नौकरी मिल रही थी, लेकिन महादेव के प्रति अपार प्रेम होने की वजह वह उस नौकरी को ठुकरा दिए।
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अभय सिंह, नागा संन्यासी। - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
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 आईआईटी बांबे से एयरो स्पेस की पढ़ाई और दो लाख महीने की नौकरी ठुकराकर अभय सिंह नागा संन्यासी बन गए। उनके इंजीनियरिंग से नागा संन्यासी बनने की वजह से जूना अखाड़ा चर्चा का विषय बना हुआ है। महाकुंभ को कवर करने आए देश भर के मीडिया कर्मियों की उनके शिविर में तांता लगा हुआ है। वह बताते हैं कि जब वह अपने घर में ध्यान करते थे तो उनके परिवार के लोग उन्हेें पागल बताकर पुलिस को सौंप दिया। उसके बाद से वह संन्यासी बनने का मन बना लिया।
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अभय सिंह मूलरूप से हरियाणा के रहने वाले हैं। उन्होंने बताया कि वह बांबे आईआईटी से एयरो स्पेस से इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। उन्हें जर्मनी में दो लाख महीने की नौकरी मिल रही थी, लेकिन महादेव के प्रति अपार प्रेम होने की वजह वह उस नौकरी को ठुकरा दिए। इसके अलावा वह प्रोडक्ट डिजाइन एनिमेशन का भी कोर्स किया। इतनी पढ़ाई करने के बाद भी उनका मन अध्यात्म की ओर ही भागता रहता था।

घर में घंटों ध्यान करते थे और परिवार के लोगों को भी अध्यात्मिक बातें बताते थे। उन्होंने अपने परिवार वालों पर आरोप लगाते हुए कहा कि उनके इस हरकत से घर वालों को बहुत चीढ़ हो रही थी क्यों कि उन्हें आस्था में भरोसा नहीं था। एक दिन वह घर में ध्यान कर रहे थे उसी दौरान उनके परिवार वाले पुलिस को फोन कर दिए और पागल बताकर उन्हें सौंप दिया। इसके बाद से उनका परिवार से मोह भंग हो गया और वह संन्यासी बनने का मन बना लिए।
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चारों धाम की कर चुके हैं यात्रा

उन्हाेंने बताया कि वह 2000 किमी पैदल चलकर चाराें धाम की यात्रा कर चुके हैं। वह अपने साथ एक डायरी रखते हैं, जिसमें वह पंच कोष के बारे में लिखा है। पहला आनंद कोष है जिसको समझाते हुए बताया कि आनंद कोष वह है जिसमें कोई बनावटी न हो, बिल्कुल जैसा का तैसा दिखाया या बताया जाय, दूसरा विज्ञान कोष, जिसमें हम अलग-अलग चीजों में फर्क को समझ पाते हैं।

तीसरा मनोमय कोष, इस कोष में हम किसी चीज को देखकर याद कर लेते हैं। चौथा प्राणमय कोष, इसके अंतर्गत हमारी शारीरिक गति विधि आती है। अंतिम और पांचवा अन्न कोष, इस कोष में हम किसी चीज को खाकर उसके बारे में महसूस करते हैं। उधर, उनके गुरु महंत हीरापुरी महाराज ने बताया कि अभी अभय सिंह उनके पास संन्यासी नहीं बल्कि साधक के रूप में आए हैं। उन्हें भगवत जाप करने के लिए कहा गया है, अभी उनकी कई तरह की परीक्षा होगी। उसमें सफल होने पर ही उन्हें दीक्षा दिया जाएगा।
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