इसी तरह महंत रामरत्न गिरि दिल्ली स्थित डीडीए में सहायक अभियंता के पद पर काम कर चुके हैं। डॉ. राजेश पुरी ने पीएचडी की उपाधि हासिल की है तो महंत रामानंद पुरी अधिवक्ता है। निरंजनी अखाड़े के अध्यक्ष महंत रवींद्र पुरी बताते हैं कि शैव परंपरा के इस अखाड़े के करीब 70 फीसदी साधु-संतों ने उच्च शिक्षा प्राप्त की है।
इस अखाड़े में संन्यास की दीक्षा योग्यता के आधार पर ही प्रदान की जाती है। इसमें संस्कृत के विद्वान और आचार्य भी हैं। निरंजनी अखाड़े की हमेशा एक अलग छवि रही है। सचिव ओंकार गिरि बताते हैं कि इस अखाड़े का गठन सनातन धर्म की रक्षा के लिए किया गया था।
सनातन धर्म के प्रचार के लिए अखाड़े की तरफ से वेद विद्या स्कूल-कॉलेजों की भी स्थापना भी की गई है। गुजरात के मांडवी जिले में पंचायती अखाड़ा निरंजनी का गठन हुआ। जिस समय निरंजनी अखाड़े की स्थापना की गई, उस समय सनातन धर्म पर हमले हो रहे थे। दूसरे धर्म के लोग अपने धर्म का विस्तार करने के साथ ही सनातन धर्म पर हमले कर रहे थे। पंचायती अखाड़ा निरंजनी में पंच परमेश्वर के महंत सबसे सर्वोच्च होते हैं।
इनके अलावा आठ श्री महंत और आठ उप श्री महंत होते हैं। इनके अलावा चार सचिव होते हैं जो सभी निर्णय लेते हैं। इस अखाड़े में सबसे महत्वपूर्ण पद पंच परमेश्वर का होता है। उनकी मंजूरी से ही फैसले होते हैं। छह साल में लगने वाले कुंभ और अर्ध कुंभ में पदों पर योग्यता के आधार पर चुनाव होता है। इसके बाद चयनित संतों को जिम्मेदारी साैंपी जाती है।
पहले महापुरुष बनकर गुरु की सेवा, फिर नागा की दीक्षा
पंचायती अखाड़ा निरंजनी में शामिल होने के नियम पहले बहुत सख्त थे, लेकिन बदलते समय के साथ कुछ राहत दी गई है। आचार्य महामंडलेश्वर कैलाशानंद बताते हैं कि इस अखाड़े में अब अपराधी, माफिया पैठ नहीं बना सकते। इसलिए कि संन्यासी का चयन योग्यता और इंटरव्यू के आधार पर होता है। अखाड़े में शामिल होने से पहले पांच साल तक ब्रह्मचर्य का पालन जरूरी है। इसके बाद महापुरुष बनाया जाता है। फिर महापुरुष का कार्य होता है कि अपने गुरु की समर्पण भाव से सेवा करे। इस दौरान महापुरुष गुरु के बर्तन, कपड़े साफ करता है। भोजन बनाने की जिम्मेदारी भी महापुरुष की ही होती है। गुरु सेवा में खरा उतरने वाले को ही नागा की दीक्षा दी जाती है।