जैसे ही मैं उस जगह की ओर बढ़ा तो देखा छोटे-छोटे टेंट लगे हुए है। टेंट के बीच में एक हवनकुंड और उसमें जलती आग, कुछ नागा साधु इसमें लगातार आहुति डाल रहे होते हैं और उनके कुछ अनुयायी उनके पास बैठे हुए होते हैं। मैं उनके टेंट की संकरी दुनिया के अंदर अब आ चुका था। मन में थोड़ा भय भी था क्योंकि वो हर किसी से बात नहीं करते और उनके क्रोधित होने का कोई भी कारण हो सकता है जो आपकी समझ से परे भी हो सकता है। हालांकि भोलेनाथ की कृपा से कुछ नागा साधुओं ने मुझे उनसे बात करने की अनुमति प्रदान की और मैं अपने मन में उठने वाले रहस्यों के बारे में उनसे पूछ पाया। मेरी पहली मुलाकात बाबा नागराज गिरी से हुई उन्होंने अपनी बातों को सामने तो रखा लेकिन बहुत से रहस्य बताने से बचते दिखे। मैंने जब उनसे पूछा तो कि आपकी दिनचर्या कैसी होती है तो उन्होंने कहा कि हमारा किसी चीज का कोई ठिकाना नहीं। जब जैसा मन करता है हम वैसा करते हैं और प्रभु की भक्ति में लीन रहते हैं। उनका मानना है कि अब हम भगवान को याद नहीं करते, अब ईश्वर उन्हें याद करते हैं और किसी भी रूप में दर्शन दे सकते हैं। प्रभु की कृपा से मेरा नाम हो रहा है। हम ऊपर वाले से कुछ वादा करके धरती पर आए हैं, उस वादे को हम निभा रहे हैं।
खुले आसमान में सूर्य की रोशनी में ही नागा करते स्नान... पढ़ें दिनचर्या
उनका आशीर्वाद लेने के बाद हम टेंट की दुनिया के और अंदर चले गए, वहां हमारी एक और नागा साधु से मुलाकात हुई। उन्होंने अपना नाम गोपाल गिरी महाराज बताया। उन्होंने बताया कि वह शंभू पंच दशनाक अखाड़े से संबंध रखते हैं। बाबा से पहला मेरा सवाल यही था कि आखिर आपका दिन कैसे व्यतीत होता है और इस दौरान आप क्या-क्या करते हैं? बाबा ने बताया कि उनकी सुबह 3 बजे होती है। वह दैनिक क्रियाओं के बाद धूनी रमाते हैं। इसके बाद वह सूर्य स्नान करते हैं। उन्होंने बताया कि सूर्य स्नान का मतलब होता है कि वो किसी भी ऐसी जगह पर स्नान नहीं करते जहां ऊपर कुछ हो। खुले आसमान में सूर्य की रोशनी के नीचे ही उनका स्नान होता है। सुबह करीब 9 बजे बाल ईश्वर के सामने बाल भोग लगाते हैं। इसके बाद अगर खाने को कुछ मिल गया तो खा लिया नहीं मिला तो नहीं खाया। अगर खाते हैं तो इस बात का ध्यान रखते हैं कि इतना न खा लें कि ध्यान लगाते समय या प्रभु को याद करते समय उन्हें नींद आ जाए। दोपहर के बाद एक बार फिर प्रभू की आराधना में लग जाते हैं, जब तक शरीर साथ देता है आराधना चलती रहती है। इसके बाद अगली सुबह से फिर वही प्रक्रिया।
नागा साधु बिस्तर पर नहीं सोते
मेरा अगला सवाल था आप लोगों की कुटिया में बिस्तर नजर नहीं आता। इस पर उनका कहना था कि नागा साधु बिस्तर पर नहीं सोते। हमने सारी सुविधाओं का त्याग कर दिया है। अब हमारा जो अखाड़ा है यही हमारे लिए सबकुछ है। अब जीना प्रभु के लिए और मरना प्रभु के लिए। मैंने उनसे पूछा कि किसी के नागा बनने की प्रक्रिया क्या होती है? उनका कहना था कि अलग- अलग अखाड़ों की प्रक्रिया अगल होती है। इसके बाद उनका कहना था कि यह इतना आसान नहीं है, पूरी प्रक्रिया में दशकों का भी समय लग सकता है। इसके बाद सब गुरु की इच्छा पर निर्भर करता है।