घाट के किनारे लेटे लोगों के लिए पन्नियां सर्दी से लड़ रही है। उनके इस संघर्ष को हवा थोड़ा कमजोर कर देती है पर पकड़ बनी हुई है। कुछ चहरे बीच-बीच में अपने चेहरे से चादर को हटा कर आस-पास से गुजरने वाले लोगों को देख लेते हैं। कुछ निगाहों में इस इंतजार के खत्म होने और उस शुभ घड़ी का हिस्सा बनने की बैचेनी है। घाट पर इस समय हजारों की संख्या में आपका सामना ऐसी ही आंखों से होता है। इसी बीच चाय-चाय की आवाजें हैं, जो ऐसा प्रतीत करा रही है जैसे आपकी इस आस्था के सफर के हम भी साथी हैं।
आखों को थोड़ा ऊपर उठाओ तो लाइटों की एक दुनिया सी नजर आती है, मानों चिल्लाकर सूर्य को चुनौती देने को तैयार हों। गंगा में इनके प्रतिबिंब को देखो तो ऐसा लगता है मानो सारे विश्व का कोई अपने होने का अहसास करा रहा हो। घाट के किनारे खड़ी नाव एक दूसरे से लिपटकर खड़ी हैं, मानों अपने आप को आने वाले तूफान के लिए तैयार कर रही हों। ऐसे में बीच-बीच में आने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है।
पुलिसवाले अपने कर्तव्य को निभाते और लोगों को घाट से दूर करते नजर आ रहे हैं। उन्हें इस बात का अहसास है कि चंद घंटों में होने वाले इस महापर्व को सावधानी से निपटाना है। लोगों की सुबसुबाहट में कई प्रकार की भाषाओं का अहसास है। उनकी सुबसुबाहट इस बात का प्रतीक है कि पूरा देश उस घड़ी का इंतजार कर रहा है। हम भी उस घड़ी का इंतजार कर रहे हैं ताकि आपकी यहां न होने की कमी को पूरा किया जा सके।