माघ मेले में माघी पूर्णिमा के स्नान से पहले ही बृहस्पतिवार को मठ मछली बंदर के शिविर में रंग-गुलाल उड़ा। यह कोई आम होली नहीं बल्कि दंडी संन्यासियों की फूलों वाली होली थी।
माघ मेले में माघी पूर्णिमा के स्नान से पहले ही बृहस्पतिवार को मठ मछली बंदर के शिविर में रंग-गुलाल उड़ा। यह कोई आम होली नहीं बल्कि दंडी संन्यासियों की फूलों वाली होली थी। शिविर में वैदिक मंत्रोच्चार के बीच माहौल भक्ति और सौहार्द के फूल रूपी रंगों में सराबोर हो गया। श्रद्धालुओं ने फूलों के साथ अबीर-गुलाल उड़ाकर नृत्य किया। अखिल भारतीय दंडी सन्यासी के सचिव स्वामी ब्रह्माश्रम के मुताबिक यह परंपरा पौराणिक है।
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आयोजन आपसी प्रेम और सामाजिक सामाजिक समरसता को बढ़ावा देने के लिए किया जाता है। माघी पूर्णिमा स्नान के साथ ही कल्पवास और माघ मेले का समापन होने लगता है। ऐसे में अपने-अपने मठों और मंदिरों की ओर प्रस्थान करने से पहले, देशभर से आए दंडी संन्यासी संगम की रेती पर एक-दूसरे से विदा लेते हैं।
मेला क्षेत्र से विदाई आंसुओं से नहीं, बल्कि फूलों की खुशबू और गुलाल के रंगों से होती है। संतों का मानना है कि यह होली का त्योहार एक-दूसरे के प्रति सम्मान और अगले वर्ष पुनः मिलने का एक पवित्र वादा है। मठ मछली बंदर के शिविर में जुटे इन महात्माओं ने यह संदेश दिया कि धर्म केवल तपस्या नहीं, बल्कि उत्सव भी है। गुलाल के टीके और पुष्प वर्षा के बीच संन्यासियों ने एक-दूसरे को बधाई दी।