इसीलिए जब शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद अपने रथ पर जाने के लिए अड़े थे, उस दौरान भी उनके पास से हजारों की संख्या में श्रद्धालु स्नान के बाद वापस जा रहे थे। मीडिया से उलट श्रद्धालुओं की कोई रुचि इस हंगामे को देखने में नहीं थी।
स्टेशन से संगम व अन्य घाटों तक, स्नान के बाद भंडारे में प्रसाद पाने तक और वहां से अपने घरों को लौट जाने तक। पंक्तिबद्ध श्रद्धालु मानो तय कर प्रयागराज आए थे कि अपने आचरण और व्यवहार से वे सनातन संस्कृति का मान बढ़ाकर अपने घरों को लौटेंगे।
सचमुच, प्रयागराज ने मौनी अमावस्या के दिन सनातन संस्कृति की ऐसी तस्वीर देखी है जिसके और विस्तार की जरूरत है। प्रशासन की ओर से ऐसी तैयारी हर पर्व पर की जाए और त्योहार मनाने का ऐसा ही जतन हर सनातनी करे तो ऐसी मिसालें और भी बनती रहेंगी। तीर्थराज प्रयाग से यही संदेश सदियों से पूरे संसार को दिया जाता रहा है।