कोरोना संकट के बीच बाहर से काम के चक्कर में आकर फंसे मजदूरों की जिंदगी पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा है। एक तरफ अभाव ने घेरा है तो दूसरी ओर घर-परिवार की बढ़ती मुसीबतें और भी भारी पड़ती जा रही हैं।
लॉकडाउन के बीच जूझते हरियाणा के भिवानी और फिरोजाबाद के मजदूरों का दर्द ऐसा ही है। यहां पैसे खत्म होने की वजह से उनके पास अब खाने-पीने की दिक्कतें पैदा हो गई हैं। उधर, परिवार की परेशानियों ने दिल की धड़कनें और बढ़ा दी हैं। इसी तरह की चिंता और तकलीफ के बीच हरियाणा और फिरोजाबाद के मजदूरों का धैर्य जवाब दे गया तो वह पैदल ही घर जाने के लिए निकल पड़े।
हरियाणा के भिवानी स्थित खावा गांव के अजीत सिंह बीते 20 मार्च को यहां काम के सिलसिले में आए थे। मेजा में उनकी जान पहचान के कुछ लोग फाइवर कुर्सियों का व्यवसाय करते थे। उनके साथ जुड़कर अजीत ने धंधा शुरू करने की सोची थी, लेकिन 22 मार्च को जनता कर्फ्यू लगा और फिर देशव्यापी लॉकडाउन होने की वजह से वह फंस गए। हफ्ते भर पहले उनके घर से फोन आया कि उनकी दादी बादामी देवी की हालत खराब हो गई है।
दो दिन पहले उनकी दादी को इस्सरवाल के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया। दादी के अस्पताल मेंभर्ती होने के पहले से ही वह घर जाने के लिए वाहन की तलाश कर रहे थे। बसें-ट्रेनें बंद होने की वजह से उन्होंने सोचा था कि दिल्ली-हरियाणा के रूट पर जाने वाला कोई ट्रक भी मिल जाएगा तो वह निकल जाएंगे, लेकिन ऐसा नहीं हो सका। अंतत: धैर्य टूट गया और सोमवार को आठ सौ किमी के सफर पर वह पैदल निकल पड़े। बैरहना पुल पर अपने कुछ साथियों के साथ पैदल मिले अजीत का कहना था कि जहां वाहन का सहारा मिलेगा, वहां पकड़ लेंगे। कोई वाहन नहीं मिला तो इसी तरह पैदल चलते जाएंगे।
इसी तरह फिरोजाबाद के हरेंद्र यहां सिरसा में फेरी पर चूड़ियां बेचने का काम करते हैं। हरेंद्र की मां भूदेवी की तबीयत कई दिनों से खराब है। घर में देखरेख करने वाला कोई नहीं है। यहां उनकेपास अब रकम भी खत्म हो गई है। ऐसे में उन्होंने भी 450 किमी का सफर पैदल ही तय करने का फैसला किया और निकल पड़े। इसी तरह हरियाणी की तोसान तहसील के बलवान सिंह भी वाहन न मिलने की वजह से पैदल ही घर के लिए निकल पड़े।
उनका कहना था कि महीने भर पहले कमाने के लिए यहां आए थे। काम तो मिला नहीं, अलबत्ता लॉकडाउन में मुसीबतें जरूर बढ़ गईं। राहत के पैकेट के सहारे किसी तरह जिंदगी चल रही थी। ऐसे में भोजन के लिए मददगारों, संस्थाओं का दिन भर इंतजार करने और लाइन की बजाए अब घर जाने का फैसला लेना पड़ा।बलवान के मुताबिक उनके कई साथी अब पैदल ही घरों का रुख कर रहे हैं।