सरकारी धन की बर्बादी और प्रशासनिक उदासीनता का इससे बड़ा उदाहरण क्या होगा कि 19 साल पहले 30 लाख की लागत से खड़ा किया गया महिला अस्पताल इलाज की राह तक रहा है। गांव में अस्पताल होते हुए भी महिलाओं को 20 किलोमीटर दूर जाना पड़ता है।
ग्रामीणों की जमीन लेने से पहले वादा किया गया था कि अस्पताल बनेगा तो गांव का नाम होगा, रोजगार मिलेगा और महिलाओं को इलाज के लिए भटकना नहीं पड़ेगा। वर्ष 2007 में अस्पताल की दीवारें तो खड़ी हो गईं लेकिन यह अस्पताल चालू न हो सका। यह अस्पताल लगभग 30 लाख की लागत से बनकर तैयार हुआ था।
अस्पताल निर्माण के लिए अपनी जमीन दान करने वाले श्रीनाथ और श्रीनारायण अब पछताते हैं। उन्होंने बताया कि अधिकारियों ने नौकरी और काम दिलाने का झांसा देकर हमसे जमीन ले ली। आज न तो अस्पताल चालू हुआ और न ही हमें कोई ढंग का काम मिला। ग्रामीणों ने जिलाधिकारी और मुख्य चिकित्सा अधिकारी के चौखट पर दर्जनों बार अर्जियां लगाईं।
करीब एक वर्ष पहले जब तत्कालीन सीएमओ और शंकरगढ़ सीएचसी अधीक्षक ने अमिलिया तरहार पहुंचकर अस्पताल का निरीक्षण किया, तो उम्मीद फिर से जगी। निरीक्षण के कुछ ही दिनों बाद जब अस्पताल परिसर की साफ-सफाई हुई और दीवारों पर ताजा रंग-रोगन (पेंटिंग) हुआ, तो ग्रामीणों को लगा कि अब सालों का इंतजार खत्म होने वाला है। लेकिन, वह पेंटिंग भी महज एक दिखावा साबित हुई। सफाई के कुछ दिनों बाद अस्पताल की इमारतों पर फिर से ताले लटक गए और आज भी वहां सन्नाटा पसरा है।
20 किलोमीटर दूर मिलता है इलाज
अस्पताल के चालू न होने की सबसे बड़ी कीमत क्षेत्र की गर्भवती महिलाओं और महिला मरीजों को चुकानी पड़ रही है। आपातकालीन स्थिति में तरहार क्षेत्र के ग्रामीणों को 20 किलोमीटर दूर शंकरगढ़ या जसरा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र जाना पड़ता है। कई बार सही समय पर इलाज न मिलने से स्थिति बेहद गंभीर हो जाती है।
वर्जन
चार बेड का महिला चिकित्सालय है। जहां पर कर्मचारी उपलब्ध न होने की वजह से इसे शुरू नहीं किया जा सका है। फिलहाल, शासन को हाल ही में पत्र लिखकर भेजा गया है। उम्मीद है कि जल्द ही कर्मचारी उपलब्ध हो जाएंगी। इसलिए अस्पताल की मरम्मत कराई गई है।
डॉ. एके तिवारी, मुख्य चिकित्सा अधिकारी, प्रयागराज