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सपा-बसपा गठबंधन से चिंतित भाजपा एक बार फिर संतों के शरण में, जाति की बाधा को साधने की बनी रणनीति

Fri, 01 Feb 2019 02:26 PM IST
देव कश्यप न्यूज डेस्क, अमर उजाला, प्रयागराज
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लोकसभा चुनाव से पहले देश के अलग-अलग हिस्सों में छिड़े जातिगत आंदोलनों तथा  उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा गठबंधन से चिंतित भाजपा एक बार फिर संतों के शरण में है। विहिप के धर्म संसद में भी यह चिंता साफ तौर से दिखी और संतों के सहारे जाति की इस बाधा को साधने की रणनीति बनाई गई।

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माना जा रहा है कि हिंदुत्व के एजेंडे को धार देकर ही मतों के विभाजन को रोका जा सकता है। कुंभ नगर में कैबिनेट बैठक और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की मंत्रियों संग संगम में डुबकी को इसी सियासत से जोड़कर देखा जा रहा है। इसी क्रम में संतों की अगुवाई में जागरूकता अभियान की कवायद शुरू की गई है।विहिप के धर्म संसद में महाराष्ट्र के मालेगांव, सहारपुर की घटना समेत अन्य आंदोलनों की संघ प्रमुख मोहन भागवत, स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती समेत सभी संतों ने जिक्र किया और चिंता जताई।

उनका कहना था कि विघटनकारी ताकतें हिंदुओं को जाति, लिंग क्षेत्र, भाषा के नाम पर तोड़ना चाहती है। इसे लेकर उन्होंने वामपंथी दलों के साथ कांग्रेस तथा अन्य पार्टियों पर हमला बोला। उनका कहना था कि ये दल ऐसी विघटनकारी ताकतों को सहारा दे रही हैं। जांच में ये बातें सामने भी आ चुकी हैं। अनुसूचित जातियों के आंदोलन की धार कुंद करने के लिए उन्होंने डॉ.भीमराव आंबेडकर के राष्ट्रवादी वक्तव्यों का सहारा लिया।
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साथ ही उनका कहना था कि हिंदू धर्म में कहीं भी भेदभाव के लिए स्थान नहीं है। कुंभ मेला में ही संतों के प्रवचन, भंडारा, मंदिरों में दर्शन, संगम स्नान की परंपरा एवं संस्कृति में जाति नहीं पूछी जाती। सभी एक होते हैं। संतों ने इसके प्रति जागरूकता अभियान की वकालत की। धर्म संसद में पारित ‘हिंदू समाज के विघटन के षड्यंत्र को रोकने’ का प्रस्ताव इसी अभियान का हिस्सा है।

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