तम्बुओं की नगरी तीर्थराज प्रयाग की पावन भूमि पर साधु-संतों, श्रद्धालुओं व कल्पवासियों का जमघट लग गया है। पूरा मेला इस समय भक्ति और आस्था के रंग में सराबोर है। हर साल की भांति इस साल भी कल्पवासी एक महीने का कल्पवास करने आये हैं। ऐसे में हम आपको एक ऐसे शख्स के बारे में बताने जा रहे हैं जो अनूठा कल्पवास कर रहा है।
यूं तो हर वर्ष श्रद्धालु एक महीने तक संगम तट पर अल्पाहार, स्नान, ध्यान एवं दान करके कल्पवास करते हैं लेकिन इसी तम्बुओं के शहर में कौशाम्बी से आये डॉक्टर रविन्द्र नाथ शुक्ल अपने शिष्यों को संगमनगरी प्रयागराज में एक महीने तक संस्कृत की शिक्षा देने के लिए लाए हैं। यहां वे अपने शिष्यों को धर्म, वेद, पुराण से लेकर देव वाणी संस्कृत का भी ज्ञान देते हैं।
रविन्द्र नाथ कौशाम्बी के मंझनपुर के एक सरकारी संस्कृत विद्यालय में प्रधानाचार्य हैं वे कुंभ व माघ मेले में अपने विद्यार्थियों के साथ विगत 20 सालों से आ रहे हैं। इससे पहले उनके पिताजी आते थे, वही परम्परा वे निभा रहे हैं।
रविन्द्र जी कहते हैं कि "बच्चों को जो शिक्षा हम अपने विद्यालय में देते हैं यहां आकर हम उसका प्रैक्टिकल कराते हैं, पूरे मेले में देश के कोने-कोने से आए साधु-संतो का धार्मिक कार्यक्रम होता रहता है जहां बच्चे बहुत कुछ सीखते हैं। कुंभ मेला शिक्षा का एक ऐसा दुर्लभ मंच है जहां हमारे बच्चे धर्म, संस्कार, वेद, पुराण आदि के बारे में विस्तृत रूप से अध्ययन करते हैं।"
रविन्द्र जी बताते हैं कि नए बच्चों का संस्कार भी यहीं होता है, हर बसन्त पंचमी को संगम तट पर नए बच्चों का संस्कार कराते हैं। यहां पर बच्चों को प्रातः 4 बजे से 6 बजे तक मंत्रोच्चारण व योग सिखाया जाता है और शाम को 4 बजे से 6 बजे तक संस्कृत व्याकरण सिखाते हैं बाकि के समय में बच्चे धर्माचार्यों के शिविरों में जाकर धर्म कथाएं सुनते हैं। रविन्द्र जी को इस अनूठे अध्यापन के लिए राष्ट्रपति पुरस्कार से पुरस्कृत भी किया जा चुका है।