छावनी में इष्ट देव की स्थापना के बाद परिक्रमा करते साधु
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अलमस्त संत हैं तो क्या अखाड़े की छावनी में सभी पर एक नियम-कानून और अनुशासन लागू होगा। यह व्यवस्था है ‘चेहरा-मोहरा’, जिससे अलग-अलग जगहों के संत, पीठाधीश्वर भी छावनी में पहुंचकर बंध गए। परंपरा के पालन के लिए अखाड़े की छावनी में बना ‘चेहरा-मोहरा’ अखाड़े की ससंद है, जिस मंच पर मेले के दौरान सभी निर्णय लिए जाएंगे। वैसे तो धर्मध्वजा की स्थापना के साथ ही अखाड़ों के महंतों, श्रीमहंतों, थानापतियों, कोतवाल आदि के अधिकार भंग हो गए थे पर पेशवाई तक उन्होंने उसी जिम्मेदारी के साथ अखाड़े की व्यवस्था संभाली।
परंपरा के मुताबिक पेशवाई के साथ कुंभ क्षेत्र की छावनी में पहुंचते ही अखाड़े की पूरी कार्यकारिणी निष्प्रभावी और कुंभ मेले की पूरी जिम्मेदारी ‘चेहरा-मोहरा’ के नाम हुई। साथ ही इसके संचालन की जिम्मेदारी अखाड़े के अष्टकौशल में से चुने गए दो प्रधानों को दी गई। फिलहाल पंचायती अखाड़ा श्री निरंजनी की ओर से महंत दिनेश गिरि और महंत सुखदेव पुरी को प्रधान नियुक्त किया गया। अब भेंट, भंडारा से लेकर दंड और व्यवस्था सभी कुछ इन्हीं प्रधानों के हवाले रहेगी।
‘अमर उजाला’ से बातचीत में महंत दिनेश गिरि ने कहा, मेले के दौरान प्रधानों को ही पूरी जिम्मेदारी संभालनी होगी। मंच पर कोई गलत रीति से चढ़ा तो भी दंड, प्रधान के निर्देशों का उल्लंघन किया तो भी दंड मिलेगा। पूरे मेले भर अखाड़े के अनुशासन और मर्यादा को बनाए रखने की जिम्मेदारी चेहरा की होगी। चेहरा जो तय करेगा, उसका पालन करना सभी के लिए जरूरी होगा, फिर वह चाहे कोई भी हो। फिलहाल पेशवाई के बाद और मुख्य स्नानपर्वो पर आचार्य महामंडलेश्वर, महामंडलेश्वर इसी पर आसन जमाएंगे।
ऐसे ही नहीं खास है ‘चेहरा-मोहरा’
‘चेहरा’ अखाड़े के प्रमुख मंच के रूप में स्थापित हैं, जिस पर कार्यकारिणी ‘अष्टकौशल’ के सदस्य बैठेंगे। इसे दो तरफ से बंद रखा गया है। इतना ही नहीं इस पर चढ़ने के लिए एक ही ओर से सीढ़ी बनाई गई है। वहीं ‘मोहरा’ वह जगह, जिस पर अखाड़े के अस्त्रशस्त्र के अतिरिक्त महंतों, श्रीमहंतों, महामंडलेश्वरों के सोने-चांदी के हौदे, सिंहासन रखे जाएंगे। खास यह कि इस पर चढ़ने के लिए कोई सीढ़ी नहीं बनाई जाती ताकि वहां तक कोई आसानी से पहुंच ही न सके।