महाकुंभ में आने वाले करोड़ों श्रद्धालुओं के प्रबंधन के तरीके तो बहुतेरे हैं, लेकिन कारगर तरीका है तिमंजिले वाच टॉवर से भीड़ संभालने का। यह चुनौतीपूर्ण काम संभालती है, होमगार्डों की तिकड़ी। इसमें शामिल हैं... हरिश्चंद्र, विमल शर्मा और जगन्नाथ पटेल। ये माइक पर ऐसे बोलते हैं, जैसे किसी से सीधे बतिया रहे हों। लोग चौंक उठते हैं सुनकर... दाएं-बाएं देखने लगते हैं। लोग उनके आग्रह को मानते भी हैं।
प्रयागराज के मांडा क्षेत्र के गांव टिकरी के रहने वाले हरिश्चंद्र बताते हैं, हम तीनों 2001 में होमगार्ड सेवा में आए। दोनों दोस्त हैं भी पड़ोसी गांव सोनाई के। हमारी नौकरी थी, वाच टॉवर की सुरक्षा की। तब, एक गुप्ताजी खोया-पाया की सूचना देते थे। एक दिन उनका गला लड़खड़ाया तो हमें हुक्म हुआ माइक संभालने का। तब से चला सिलसिला 25 बरस तक जारी है। वैसे, शुरू में हम पांच की ड्यूटी लगी थी, लेकिन टिक पाए सिर्फ हम तीन। इसलिए, कि हम सबका गला अच्छा था और भाषा भी शालीन-लोचदार।
हमारी भाषा आई कीर्तन से। उस वक्त बहुत पैसा तो था नहीं होमगार्ड सेवा में। सो, गांव में कीर्तन कर लिया करते थे। दो-तीन घंटे ढोल-मंजीरा बजाते, बदले में खाना-पीना हो जाता। धीरे-धीरे जबान सुधरी और लट्ठमार भाषा लठिया दी गई। महाकुंभ, कुंभ और माघ मेले में सेवाएं देते-देते यह इतनी दुनियादारी देख चुके हैं कि अपना क्रोध गंगाजल की तरह पी गए। आइए सुनिए, इनकी बोली-इनकी बानी...