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मुकदमा नहीं होगा वापस, सरकार और करवरिया बंधुओं को झटका

Sat, 20 Jul 2019 01:01 AM IST
इलाहाबाद ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, प्रयागराज
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udaybhan karwariya - फोटो : प्रयागराज
जवाहर पंडित हत्याकांड का मुकदमा वापस लेने के मामले में प्रदेश सरकार और करवरिया बंधुओं को हाईकोर्ट से झटका लगा है। मुकदमा वापसी को लेकर दाखिल सरकार की निगरानी (रिवीजन) याचिका, उदयभान करवरिया की याचिका हाईकोर्ट ने खारिज कर दी है। हाईकोर्ट ने वाद वापसी के प्रदेश सरकार के निर्णय को गलत करार देते हुए इसे खारिज करने के एडीजे के आदेश को सही ठहराया है। याचिकाओं पर मुख्य न्यायमूर्ति गोविंद माथुर ने सुनवाई की।

याचिका खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि सभी तथ्यों पर विचार करने के बाद वह इस मत पर हैं कि अभियुक्तों पर से मुकदमा वापस लेने की सहमति देने से इंकार करने का ट्रायल कोर्ट का निर्णय सही है, इसमें कोई अवैधानिकता नहीं है। ट्रायल कोर्ट जज एडीजे रमेश चंद्र ने 10 दिसंबर 2018 को वाद वापसी की अनुमति देने इंकार कर दिया था। इस फैसले के खिलाफ प्रदेश सरकार ने हाईकोर्ट में रिवीजन दाखिल किया था। इसके साथ ही उदयभान करवरिया ने भी सीआरपीसी की धारा 482 के तहत अर्जी दाखिल की थी। कोर्ट ने दोनों पर एक साथ सुनवाई की।

प्रदेश सरकार की ओर से अपर महाधिवक्ता मनीष गोयल और अपर शासकीय अधिवक्ता एके संड, जबकि वादी विजमा यादव की ओर से अधिवक्ता स्वाती अग्रवाल ने कोर्ट के सामने तर्क रखे। सरकार का कहना था कि ट्रायल कोर्ट ने वाद वापसी की अनुमति से इंकार करते समय विशेष लोक अभियोजक की दलीलों को समझने में भूल की है। लोक अभियोजक ने सभी तथ्यों और साक्ष्यों का परीक्षण करने के बाद मत दिया था कि अभियुक्तगण पर मुकदमा जारी रखना न तो जनहित में होगा और न ही न्यायहित में। धारा 321 सीआरपीसी के तहत विशेष लोक अभियोजक को फैसला आने से पूर्व किसी भी स्तर पर सरकार की अनुमति से वाद वापसी का अधिकार है। सरकारी अधिवक्ता की यह भी दलील थी कि सरकार ने वाद वापसी से पूर्व मुकदमे के सभी तथ्यों और दस्तावेजों का सावधानी से निरीक्षण किया था। इसके बाद ही राज्यपाल ने वाद वापसी की अनुमति दी।

वादी विजमा यादव की अधिवक्ता स्वाती अग्रवाल का कहना था कि अभियुक्तगण शक्तिशाली राजनीतिक लोग हैं। वह लगातार मुकदमे को लंबित करने की कोशिश में लगे हैं और वह 18 वर्षों तक ऐसा करने में सफल रहे हैं। सुप्रीमकोर्ट के निर्देश के बाद इस मामले का ट्रायल शुरू हो सका है।
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kapilmuni karwariya - फोटो : प्रयागराज
जवाहर पंडित हत्याकांड का मुकदमा वापस लेने की मांग खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने वादवापसी के सरकार के निर्णय और विशेष लोक अभियोजक संस्तुति पर सवाल उठाए। कोर्ट ने कहा कि लोक अभियोजक ने दिसंबर 2017 में दी गई अपनी राय में कहा था कि इस मामले में सजा कराने योग्य पर्याप्त साक्ष्य हैं। मगर सरकार से निर्देश प्राप्त होते ही उनकी राय एकदम से बदल गई। दो दिसंबर को जिलाधिकारी ने उनको सरकार की मंशा से अवगत कराया और तीन दिसंबर को ही उन्होंने वादवापसी की अर्जी दे दी। जाहिर है कि सारा निर्णय हड़बड़ी में लिया गया है।
कोर्ट ने सरकारी वकील की इस दलील को नहीं माना कि लोक अभियोजक लंबे समय से इस मुकदमे से जुडे़ रहे हैं और उनको सभी बातोें की जानकारी थी। ट्रायल कोर्ट ने अर्जी खारिज करते हुए अपने विवेक का प्रयोग नहीं किया। हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल जज ने मुकदमे के हर पहलू पर बारीकी से विचार करने के बाद वाद वापसी से इंकार किया है।
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surajbhan karwariya - फोटो : प्रयागराज

इन आधारों पर खारिज हुई याचिका
1- वादवापसी की प्रक्रिया विधायक नीलम करवरिया की अर्जी पर शुरू की गई जो अभियुक्त उदयभान करवरिया की पत्नी है।
2- वादवापसी जनहित में नहीं है। मामला 1996 का है और किसी न किसी वजह से अब तक लंबित रहा।
3- अभियुक्त की 482 की अर्जी पर हाईकोर्ट ने विचारण स्थगित करते हुए निर्णय सुरक्षित कर लिया। और दो साल तक निर्णय नहीं दिया।
4- फैसला सुरक्षित रखने वाले जज के रिटायर होने के बाद भी इस पर सुनवाई शुरू नहीं की गई।
5- 2015 में दुबारा सुनवाई शुरू हुई और याचिका खारिज होने के बाद अभियुक्तों को सरेंडर करना पड़ा
6- ट्रायल शुरू होने के बाद भी अभियुक्तगण किसी न किसी वजह से याचिकाएं दाखिल करते रहे।

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cour - फोटो : प्रयागराज
पूर्व विधायक जवाहर यादव उर्फ पंडित की हत्या अब से करीब 23 साल पहले 13 अगस्त 1996 को शाम सात बजे सिविल लाइंस क्षेत्र में हुई थी। जिले का यह पहला ऐसा हत्याकांड था जिसमें अत्याधुनिक एक-47 राइफल का इस्तेमाल किया गया। कॉफी हाउस के नजदीक मारुती कार में बैठे जवाहर यादव को मारुति वैन से आए शूटरों ने ताबड़तोफ फायरिंग कर मौत के घाट उतार दिया था। हमले में जवाहर यादव और कार ड्राइवर गुलाब यादव की मौत हो गई जबकि पीछे की सीट पर बैठे कल्लन यादव को गंभीर रूप से जख्मी हालत में अस्पताल ले जाया गया। एक राहगीर की भी इस गोलीबारी में मौत हो गई थी। घटना की रिपोर्ट जवाहर के भाई सुलाकी यादव ने सिविल लाइंस थाने में दर्ज कराई थी। इसमें उदयभान करवरिया, कपिल मुनि करवरिया, सूरजभान करवरिया और रामचंद्र उर्फ कल्लू के अलावा श्याम नारायण करवरिया उर्फ मौला के खिलाफ नामजद रिपोर्ट दर्ज कराई गई। बाद में मौला की मृत्यु हो गई।
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : डेमो
घटना की जांच सिविल लाइंस पुलिस ने शुरू की मगर 29 अगस्त 1996 को डा. मुरली मनोहर जोशी के पत्र पर इसे सीबीसीआईडी इलाहाबाद को ट्रांसफर कर दिया गया। सीबीसीआई ने सात से 27 सितंबर तक में जांच पूरी की मगर इसके बाद पुन: जांच सीबीसीआईडी वाराणसी को स्थानांतरित कर दी गई। इसके बाद 22 जून 2002 को एक बार फिर जांच वाराणसी शाखा से लेकर सीबीसीआईडी लखनऊ शाखा को दे दी गई। इस तरह से घटना के आठ साल बाद सीबीसीआईडी लखनऊ ने जांच पूरी कर 20 जनवरी 2004 को अपनी रिपोर्ट दाखिल की। 27 जनवरी 2004 को कोर्ट ने इस पर संज्ञान लेते हुए सरकार बनाम कपिल मुनि करवरिया आदि के नाम से केस रजिस्टर किया। कपिल मुनि करवरिया के 27 जुलाई 2008 के पत्र पर सरकार ने एक बार फिर मामले की अग्रिम विवेचना सीबीसीआईडी इलाहाबाद को सौंप दी। इसके बाद कपिल मुनि करवरिया की 482 की अर्जी पर हाईकोर्ट ने मुकदमे के ट्रायल पर रोक लगा दी जो पांच जनवरी 2015 को सुप्रीमकोर्ट का आर्डर होने तक प्रभावी रही। सुप्रीमकोर्ट के बाद के बाद हाईकोर्ट में फिर से याचिका की सुनवाई हुई और इसे खारिज कर दिया गया। इसके बाद सभी अभियुक्तों को सरेंडर कर जेल जाना पड़ा।
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