Kanha birthday celebrations for 120 years
प्रयागराज। रामदल और रामलीला की परंपरा वाले प्रयागराज में कान्हा का जन्मोत्सव मनाने की परंपरा भी पुरानी है। मंदिरों से इतर अनेक घरों में भी तकरीबन सवा सौ बरस पहले जैसे कान्हा का जन्मोत्सव मनाया जाता था, वही परंपरा आज भी और श्रद्धा तथा उत्साह से जारी है।
मुट्ठीगंज में मुंशी रामप्रसाद की बगिया में सन1899 में मुंशी राम प्रसाद, अयोध्या प्रसाद एवं कामता प्रसाद की ओर से राधा कृष्ण मंदिर के निर्माण के साथ ही कान्हा का जन्मोत्सव मनाने की क्रम आरंभ हुआ था जो आज भी जारी है। मंदिर में कृष्ण की अष्टधातु से बनी मूर्ति के साथ गरुण एवं हनुमान जी की भी मूर्तियां हैं। पत्थरों पर अद्भुत नक्काशी से तैयार मंदिर के गुंबद पर सोने का सूरज है, जिसकी खूबी यह कि यह सूरज के पूरब से पश्चिम होने के साथ ही घूमता है। संचालक कुमार नारायण कहते हैं, पुरखों की यह परंपरा उसी श्रद्धा एवं उल्सास से जारी है। कान्हा जन्मोत्सव के साथ ही यहां अन्नकूट का भव्य भोग भी लगाया जाता है।
इसी तरह लूकरगंज में बारह बंगलिया के करीब हाईकोर्टकर्मी भगवती प्रसाद निगम तथा उनकी पत्नी कृष्णा कुमारी निगम ने अपने बेटे की कुशलता की कामना से वर्ष 1945 में कान्हा जन्मोत्सव की शुरुआत की थी। आरंभ में कान्हा की छोटी सी प्रतिमा कमरे की ताख पर स्थापित करके पास में झांकी सजाई गई। पास-पड़ोस के लोगों के साथ कान्हा जन्मोत्सव मनाने का जो क्रम आरंभ हुआ था, दुर्गा प्रसाद निगम एवं परिवार के सदस्यों ने तीन चौथाई शताब्दी बीतने पर भी उसे उसी भव्यता से जारी रखा है। सन 1970 में वृंदावन से अष्टधातु की राधाकृष्ण की मूर्ति की स्थापना के साथ श्री बृजरस रसिक भजन मंडल भी गठित की गई। यहां की झांकियां मनोरम और छठी उत्सव आनंददायी होती हैं।
लूकरगंज में ही सन 1920 में तत्कालीन जिलेदार और कृष्ण भक्त लाल बिहारी लाल ने एक छोटे से समारोह के रूप में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी मनाने की शुरुआत की थी। कहते हैं, भक्त सूरदास की शिष्य परंपरा के ही किसी संत ने इसकी प्रेरणा दी, फिर तो उनके बेटे बृजबिहारी लाल और फिर अरुण कुमार सक्सेना ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया। खास यह कि यहां अब भी प्राचीन मूर्तियों, लकड़ी के विमान, झूला, मुकुट का प्रयोग किया जाता है।