अदालतों के दर्जे को लेकर चली आ रही भ्रम की स्थिति को समाप्त करते हुए हाईकोर्ट ने कहा है कि न्यायिक प्रकृति का कार्य करने वाले प्राधिकारी ‘अदालत’ नहीं हैं। दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 195 के तहत मात्र सिविल, आपराधिक, राजस्व और अधिकरण को ही अदालत का दर्जा प्राप्त है। निबंधक जैसे प्राधिकारी इस परिभाषा में नहीं आते हैं। इस क्रम में वसीयत पंजीकृत करने के लिए नियुक्त निबंधक या उपनिबंधक को अदालत नहीं माना जाएगा। हालांकि, इनके कार्य की प्रकृति न्यायिक ही मानी जाएगी। मुआवजा निर्धारण करने वाले प्राधिकारी भी कोर्ट की श्रेणी में नहीं आएंगे क्योंकि वे पक्षकारों के बीच हक का निस्तारण नहीं कर सकते हैं।
मसूद परवेज की याचिका पर सुनवाई कर रही न्यायमूर्ति दिलीप गुप्ता और न्यायमूर्ति आरएन कक्कड़ की पीठ ने कहा कि जिला निबंधक के समक्ष छल पूर्वक आदेश लेने के मामले में धारा 340 सीआरपीसी के तहत अभियोग नहीं चलाया जा सकता है क्योंकि यह धारा मात्र अदालतों से छल पूर्वक आदेश लेने पर ही अभियोग चलाने का अधिकार देती है। याची की वकील अर्चना त्यागी का कहना था कि उसके विपक्षी ने जिला निबंधक की कोर्ट में फर्जी दस्तावेज दाखिल कर आदेश प्राप्त किए लिहाजा उनके विरुद्ध 340 सीआरपीसी के तहत मामला चलाया जाए। यहां यह प्रश्न उठा कि जिला निबंधक को अदालत माना जाएगा या नहीं। कोर्ट ने कहा कि पुरानी दंड प्रक्रिया संहिता और 1973 की संशोधित संहिता में कोर्ट की स्थिति को लेकर अंतर है। सुप्रीमकोर्ट ने केशव नारायण बनर्जी केस में निबंधक को कोर्ट नहीं माना है।