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‘जानते तो यहां नहीं आते, सीधे कचरी ही चले जाते’

Sun, 27 Sep 2015 01:54 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
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इलाहाबाद। करछना के कचरी में दो हफ्ते पूर्व किसानों पर हुई पुलिसिया कार्रवाई को लेकर सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर ने शनिवार को तीखा आक्रोश जताया। कहा, यह कैसा जनतंत्र है जिसमें किसानों को सामान्य सभा करना भी मुश्किल हो गया है। सामान्य सभा पर पुलिसिया दमन झेलना पड़ रहा है। नाबालिग बच्चों पर झूठे केस लगा कर उन्हें जेल में बंद किया जा रहा है। 
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कचरी जाने पर प्रशासन की रोक और गिरफ्तारी के बाद पुलिस लाइन पहुंची मेधा ने कचरी में दो हफ्ते पूर्व किसानों पर हुए लाठीचार्ज और पुलिसिया कार्रवाई को लेकर कई सवाल खड़े किए। केंद्र और प्रदेश की सरकार को निशाने पर रखते हुए मेधा बोलीं, नरेंद्र मोदी और अखिलेश की सरकार में कोई फर्क नहीं है। हम यही देखना चाहते थे, देख लिया। कचरी के किसान तो सामान्य सभा ही कर रहे थे पर पुलिस ने उसे छावनी बना दिया। लोगों को घर से बाहर नहीं निकलने दिया जा रहा है।

मुझे आज (शनिवार) वहां आम सभा करनी थी लेकिन जिला प्रशासन ने पत्र देकर सभा करने पर रोक लगा दी। इतना ही नहीं गांवों में जाने से भी रोक दिया। पुलिस इलाहाबाद विश्वविद्यालय के गेस्ट हाउस में ही हमें घेरने लगी, फिर हम चलते हुए स्वराज विद्यापीठ पहुंचे, वहां भी घेरने लगे तो धरने पर बैठ गई। यह तो जनतंत्र के खिलाफ है।
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‘अमर उजाला’ से बातचीत में मेधा बोलीं, मुझे इस बात का जरा भी भान नहीं था कि पुलिस ऐसे पेश आएगी, नहीं तो यहां न आकर सीधे कचरी ही चले जाते। यह हरकत ‘विनाश काले विपरीत बुद्धि’ वाली है। 1800 किसानों में से जिन्होंने मुआवजा नहीं लिया है, उनकी जमीन वापस कर दी जाए लेकिन सरकार अदालत का फैसला भी नहीं मान रही है। नाबालिग बच्चों को जेल में रखना, झूठे केस लगाना, लोगों को भागने के लिए मजबूर करना कौन सा समाजवादी तरीका है। सभी जनसंगठन कह रहे हैं कि नौ सितंबर को न कोई अनहोनी, न ही हिंसक घटना हुई है। सच और झूठ का पता चल जाएगा।
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