कोर्ट ने पाया कि आयु निर्धारण में पेश स्कूल के स्कॉलर रजिस्टर में कटिंग की गई थी। दस्तावेजी और मौखिक साक्ष्य में गंभीर विरोधाभास के बावजूद अभियोजन की ओर से पीड़िता की रेडियोलॉजिकल जांच भी नहीं कराई गई थी। कोर्ट ने आरोपी को बरी किए जाने के ट्रायल कोर्ट के फैसले पर मुहर लगाते हुए राज्य सरकार की अपील को खारिज कर दी।
कहा कि आपराधिक मामलों में सबूत का भार हमेशा अभियोजन पर होता है। इसलिए दुष्कर्म के मामलों में पीड़िता को नाबालिग साबित करने की जिम्मेदारी अभियोजन की थी, न कि आरोपी की। मौजूदा मामले में अभियोजन पीड़िता को नाबालिग साबित करने में विफल रहा है। लिहाजा, ट्रायल कोर्ट की ओर से आरोपी के पक्ष में पारित दोषमुक्त का आदेश बिल्कुल सही और कानूनी दृष्टि से दोषरहित है।