महुए से चोरी-छिपे तैयार की जाने वाली अवैध कच्ची दारू इलाहाबाद में भी पिछले एक दशक के दौरान 50 से ज्यादा लोगों की जान ले चुकी है। कई लोगों की मौतों की बड़ी घटनाओं के अलावा एक या दो लोगों के जहरीली शराब से मरने के कई मामले सामने आए। हर घटना के बाद आबकारी और पुलिस विभाग की ओर से सख्ती की गई मगर कुछ ही समय गुजरने के बाद जहरीली शराब की भट्ठियां फिर धधकने लगीं।
अवैध शराब का सबसे बड़ा कहर सितंबर 2010 में मऊआइमा इलाके में टूटा था। सात सितंबर 2010 को मऊआइमा के मऊदोस्तपुर, चिगिया का पूरा, चौहान का पूरा समेत पांच गांव में जहरीली शराब पीने से एक के बाद एक 14 लोगों ने जान गंवा दी। इससे भी ज्यादा लोग अस्पताल में भर्ती हुए। उनकी आखों की रोशनी छिन गई। इन गरीब परिवारों पर तो आफत ही टूट पड़ी। पुलिस और आबकारी के अधिकारियों पर कार्रवाई हुई लेकिन मऊआइमा इलाके में कच्ची दारू का अवैध धंधा थमा नहीं है।
उससे एक साल पहले हंडिया इलाके के धनूपुर ब्लाक में भी दो महीने के अंतराल में कच्ची शराब पीने से तीन लोगों की मौत हो गई और आधा दर्जन से ज्यादा लोगों को बेहद गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती किया गया था। इसके अलावा, अरैल, बहमलपुर, नीवां, घूरपुर के बिरवल जैसे कछारी गांवों में कच्ची शराब ने दस साल में 20 से ज्यादा लोगों की जान ली है।
शहर से सटे नैनी में अरैल ऐसा गांव है जहां अवैध कच्ची शराब का धंधा औरतों के हाथों में है। पुलिस और आबकारी की टीम छापा मारती है तो वहां औरतें ही शराब की भट्ठियां धधकाते पकड़ी जाती हैं। दरअसल, अरैल में ज्यादातर पुरुष शराब पीकर मारे गए या दुश्मनी में उनका कत्ल हो गया। ऐसे में पति की मौत के बाद परिवार के गुजारे का और कोई जरिया नहीं होने की वजह से महिलाएं भी यहीं धंधा करने लगी हैं।