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भारतीय ज्ञान परंपरा एक अविरल और समावेशी धारा : शिव प्रताप शुक्ल

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गोविंद बल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान के सभागार में शनिवार को ‘भारतीय ज्ञान परंपरा: दार्शनिक आधार, साहित्यिक संस्रोत और लोक परंपराएं’ विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी हुई। मुख्य अतिथि हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल शिवप्रताप शुक्ल ने गोविंद बल्लभ पंत की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर श्रद्धांजलि अर्पित की। इस दौरान संस्थान की ओर से प्रकाशित पुस्तक ‘गठरी’ का विमोचन किया गया। पुस्तक का परिचय डॉ. अर्चना सिंह ने दिया।
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राज्यपाल शिवप्रताप शुक्ल ने कहा कि यह समय बौद्धिक पुनर्मूल्यांकन का है। भारतीय ज्ञान परंपरा एक अविरल और समावेशी धारा है जो केवल सूचना का संकलन नहीं, बल्कि जीवन को समझने और आत्मबोध प्राप्त करने की सतत प्रक्रिया है। यह परंपरा समाज को चिंतन, संवाद की दिशा में अग्रसर करती है।
स्वागत भाषण देते हुए प्रो. योगेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि यह परंपरा शास्त्र और लोक, दोनों के समन्वय से निर्मित हुई है। मुख्य वक्ता प्रो. रमा शंकर दुबे ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा विश्व की प्राचीनतम और सर्वाधिक समृद्ध बौद्धिक धरोहर है। अध्यक्षता इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रो.हर्ष कुमार ने की। प्रो. आनंद शंकर सिंह ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा के केंद्र में मानवीय मूल्य निहित हैं।
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प्रोफेसर गिरेंद्र सिंह तोमर व प्रो.भावना चौहा ने भारतीय दर्शन की नैतिक और तर्कपरक संरचना पर अपने विचार दिए। समापन सत्र की अध्यक्षता प्रो. टीवी कट्टीमनी, अध्यक्ष, बोर्ड ऑफ गवर्नर्स, गोविंद बल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान ने की। विशिष्ट वक्ता प्रो. रजनीश शुक्ल व प्रो. हरिकेश सिंह ने भी अपने विचार रखे। संचालन डॉ. सुभाष कुमार ने किया।
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