इलाहाबाद। कैरियर की चिंता, दोस्तों के साथ मौज-मस्ती या फिर सोशल साइट्स पर समय बिताना, आज के युवाओं की जिंदगी यहीं तक सिमटी मानी जाती है लेकिन एक तस्वीर दूसरी भी है। भीड़ से अलग कुछ ऐसे युवा भी हैं जो समाज के प्रति अपने दायित्वों को न केवल बखूबी समझते हैं, बल्कि उसे शिद्दत के साथ निभा भी रहे हैं। यह इस बात को समझते हैं कि जब तक युवा सामाजिक सरोकारों से नहीं जुडे़ंगे तब तक समाज को रूढ़िवादी मानसिकता और अज्ञानता के भंवर से बाहर निकाल कर ‘युवा’ नहीं बनाया जा सकता। अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस पर पेश है ऐसे ही कुछ युवा और उनके ग्रुप कहानियां...।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय में रसायन विज्ञान के शोध छात्र बृजेश शुक्ला उन युवाओं के लिए मिसाल हैं, जो यह सोचते हैं कि हमें समाज से क्या लेना। विकलांग बृजेश शुक्ला जरूरतमंद बुजुर्गों से लेकर बच्चों तक की मदद के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं। वृद्धाश्रमों में बुजुर्गों को उनकी जरूरत के सामान उपलब्ध कराते हैं। गरीब बच्चों को किताबें, बैग, टिफिन देते हैं। अपनी फेलोशिप की आधी धनराशि इन्हीं कामों में खर्च करते हैं। रविवार छुट्टी का दिन भी इन्हीं के नाम रहता है। 2010 से सेवा कार्य में लगे बृजेश बताते हैं कि सभी अगर सिर्फ अपने ही बारे में सोचेंगे तो समाज का विकास नहीं होगा। युवा होने के नाते समाज के प्रति मेरी कुछ जिम्मेदारियां हैं, बस उन्हीं को मैं पूरा करने की कोशिश करता रहता हूं।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के सर सुंदर लाल छात्रावास के अंत:वासियों और डिग्री कॉलेजों के छात्राें का ‘पुनर्जीवन’ समूह रक्तदान करके मरीजों को नया जीवन देता है। डेढ़ साल पहले इस ग्रुप को बनाने वाले शोध छात्र आलोक त्रिपाठी कहते हैं कि रक्तदान से बढ़कर कोई दान नहीं है। अक्सर ही ऐसा होता है कि जरूरतमंदों को खून के लिए परेशान होना पड़ता है। हमें भी अपने एक दोस्त के इलाज के लिए ब्लड की व्यवस्था करने में काफी परेशान होना पड़ा था। तभी यह ग्रुप बनाने का निर्णय लिया। ग्रुप में इस वक्त सौ से अधिक छात्र-छात्राएं जुड़े हैं। ग्रुप की ओर से लोगों को ज्यादा से रक्तदान के लिए प्रेरित भी किया जाता है, जिससे कभी किसी की खून न मिल पाने की वजह से मौत न हो।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय में बीएससी तृतीय वर्ष की छात्र-छात्राओं का ‘उड़ान’ ग्रुप अपना कैरियर संवारने के साथ गरीब बच्चों को साक्षर बनाने की दिशा में भी काम कर रहा हैं। उड़ान ग्रुप के सदस्य अपनी क्लास के बाद शाम को गरीब बच्चों को पढ़ाते हैं। ग्रुप बनाने वाले प्रशांत और उसके दोस्त बनाते हैं कि पिछले वर्ष यह ग्रुप बनाया। इन बच्चों की पढ़ाई और दूसरी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए विवि परिसर में जगह-जगह बॉक्स रखते हैं। जिसमें छात्र-छात्राएं खिलौने, किताबें, कपड़े आदि सामान रखते हैं। इसमें जो सामान एकत्र होता है, उन्हें बच्चों के बीच बांटते हैं। अपनी पॉकेट मनी का भी कुछ हिस्सा यह लोग बच्चों की जरूरत पूरा करने में खर्च करते हैं।