इलाहाबाद (ब्यूरो)। केंद्र सरकार की ओर से जारी धर्म आधारित आबादी के आंकड़ों में राजनीतिक निहितार्थ की तलाश शुरू हो गई है। सामाजिक सरोकारों से जुड़े जानकार कहते हैं, सामाजिक और आर्थिक विकास और जनसंख्या नियंत्रण के अतिरिक्त नीति बनाने सहित सभी समस्याओं के निदान में ये आंकड़े खासा महत्व के हैं लेकिन राजनीतिज्ञों के लिए अपनी रोटियां सेंकने की राह भी साफ हो गई है।
समाजशास्त्रियों और राजनीतिक विशेषज्ञों का साफतौर पर कहना है कि ये आंकड़े राजनीतिक मुद्दे बनने जा रहे हैं। धर्म और जाति में फंसी बिहार एवं उत्तर प्रदेश की राजनीति में ये आंकड़े बड़ा फैक्टर बनेंगे क्योंकि इनके आधार पर मतों के ध्रुवीकरण की कोशिश होगी। इस बारे में राजनेताओं के बोल इन आशंकाओं को और बल दे रहे हैं।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कुलपति तथा समाजशास्त्री प्रोफेसर ए.सत्यनारायण का कहना है कि धर्म आधारित इन आंकड़ों का विकास से कोई मतलब नहीं है। बढ़ती जनसंख्या के व्यवसाय और शिक्षा के स्तर आदि विषयों पर कोई बात नहीं की गई है। ऐसे में इनका कोई महत्व नहीं है।
फिलहाल इन आंकड़ों का सिर्फ राजनीति महत्व है क्योंकि ये आंकड़े देश और प्रदेश की राजनीति को काफी हद तक प्रभावित करेंगे। उत्तर प्रदेश राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर एमपी दुबे भी कहते हैं, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक दृष्टि से बहुत महत्व के इन आंकड़ों से राजनेताओं को एक मुद्दा मिल गया है। समस्याओं के मूल में जनसंख्या वृद्धि है और इसके लिए नीति बनाने में ये आंकड़े महत्वपूर्ण हैं।
गोविंद बल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान के निदेशक प्रोफेसर प्रदीप भार्गव का कहना है कि वर्ग के अनुसार जनगणना की परंपरा अंग्रेजों के समय से चली आ रही है। विकास में इन आंकड़ों का विशेष महत्व होता है लेकिन यह सरकार पर निर्भर करता है कि वह इनका किस तरह से इस्तेमाल करती है। इनका उपयोग राजनीतिक हित साधने में किया जाएगा इस बात की पूरी संभावना है।