इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि आजादी के बाद न तो राजा बचे हैं और न ही राजतंत्र। किसी शैक्षणिक संस्था के प्रबंधन से जुड़े विवादों का निपटारा केवल कानूनी साक्ष्यों के आधार पर होगा, न कि पारिवारिक समझौतों, परंपराओं या राजसी विरासत के सहारे। इस टिप्पणी के साथ मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति शैलेंद्र क्षितिज की खंडपीठ ने आगरा के प्रसिद्ध बलवंत एजुकेशनल सोसाइटी के प्रबंधन को लेकर एकल पीठ के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें अवागढ़ रियासत के दो चचेरे भाइयों के बीच उपाध्यक्ष के कार्यकाल को ढाई-ढाई साल के लिए बांटने को कहा गया था। कोर्ट ने मामले के निपटारे तक सोसाइटी की देखरेख का जिम्मा अध्यक्ष के रूप में आगरा के जिला जज को सौंपा है।
क्या था विवाद
आगरा के राजा बलवंत सिंह कॉलेज और उससे जुड़े अन्य शिक्षण संस्थाओं के संचालन के लिए बनी सोसाइटी में अवागढ़ राजपरिवार में वर्चस्व को लेकर दो चचेरे भाइयों जितेंद्र पाल सिंह और अनिरुद्ध पाल सिंह के बीच दशकों से कानूनी जंग चल रही है। सोसाइटी के उपाध्यक्ष पद को लेकर दोनों अपनी विरासत और वरिष्ठता के आधार पर दावा कर रहे हैं।