फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

UP : हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी- राजा बचे न राजतंत्र, प्रबंधन का संचालक कौन होगा, यह तय करेगा कानून

Fri, 06 Feb 2026 06:54 AM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि आजादी के बाद न तो राजा बचे हैं और न ही राजतंत्र। किसी शैक्षणिक संस्था के प्रबंधन से जुड़े विवादों का निपटारा केवल कानूनी साक्ष्यों के आधार पर होगा, न कि पारिवारिक समझौतों, परंपराओं या राजसी विरासत के सहारे।
विज्ञापन
इलाहाबाद हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला।
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि आजादी के बाद न तो राजा बचे हैं और न ही राजतंत्र। किसी शैक्षणिक संस्था के प्रबंधन से जुड़े विवादों का निपटारा केवल कानूनी साक्ष्यों के आधार पर होगा, न कि पारिवारिक समझौतों, परंपराओं या राजसी विरासत के सहारे। इस टिप्पणी के साथ मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति शैलेंद्र क्षितिज की खंडपीठ ने आगरा के प्रसिद्ध बलवंत एजुकेशनल सोसाइटी के प्रबंधन को लेकर एकल पीठ के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें अवागढ़ रियासत के दो चचेरे भाइयों के बीच उपाध्यक्ष के कार्यकाल को ढाई-ढाई साल के लिए बांटने को कहा गया था। कोर्ट ने मामले के निपटारे तक सोसाइटी की देखरेख का जिम्मा अध्यक्ष के रूप में आगरा के जिला जज को सौंपा है।

विज्ञापन


क्या था विवाद

आगरा के राजा बलवंत सिंह कॉलेज और उससे जुड़े अन्य शिक्षण संस्थाओं के संचालन के लिए बनी सोसाइटी में अवागढ़ राजपरिवार में वर्चस्व को लेकर दो चचेरे भाइयों जितेंद्र पाल सिंह और अनिरुद्ध पाल सिंह के बीच दशकों से कानूनी जंग चल रही है। सोसाइटी के उपाध्यक्ष पद को लेकर दोनों अपनी विरासत और वरिष्ठता के आधार पर दावा कर रहे हैं।

विज्ञापन

एकल पीठ ने कहा था...जरूरी नहीं कि राजा का बड़ा बेटा ही बने राजा

इससे पहले मामला हाईकोर्ट की एकल पीठ में सुना गया था। कोर्ट ने उपाध्यक्ष के पांच वर्ष के कार्यकाल को दोनों भाइयों में ढाई-ढाई साल के लिए बांट दिया था। कहा था कि राजशाही का दौर खत्म हो चुका है। ऐसे में जरूरी नहीं कि राजा का बड़ा बेटा ही राजा हो। हालांकि, प्रबंध समिति व दोनों पक्षकारों ने इस फैसले के खिलाफ खंडपीठ में विशेष अपील दाखिल की थी।

पक्षकार समझौते के लिए तैयार नहीं तो अदालत फैसला नहीं थोप सकती

खंडपीठ ने कहा कि रिट क्षेत्राधिकार के तहत हाईकोर्ट सोसाइटी के मूल उपनियम से हटकर प्रबंधकीय संचालन के लिए खुद कोई नई व्यवस्था या योजना नहीं बना सकता। उत्तराधिकार और वसीयत जैसी तकनीकी विवादों का निपटारा केवल सिविल कोर्ट में सबूतों के आधार पर हो सकता है। यदि पक्षकार आपसी सहमति से विवाद नहीं सुलझा पा रहे तो अदालत जबरन उन पर कोई नया समझौता नहीं थोप सकती।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें