इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि किसी आपराधिक मामले में चश्मदीदों की मौखिक गवाही को मेडिकल साक्ष्य पूरी तरह से झुठला दें तो सजा बरकरार नहीं रखी जा सकती। संदेह का लाभ आरोपी को मिलना चाहए। इस टिप्पणी संग कोर्ट ने फतेहपुर के 39 साल पुराने हत्याकांड में आरोपी को बरी कर दिया। यह आदेश न्यायमूर्ति सिद्धार्थ वर्मा, न्यायमूर्ति जय कृष्ण उपाध्याय की खंडपीठ ने जगदीश और अन्य की अपील पर दिया है। याचियों पर हत्या के आरोप में खागा थाने में 1986 में प्राथमिकी दर्ज की गई थी। ट्रायल कोर्ट ने दोषी करार देते हुए सजा सुनाई थी। इस फैसले को याचियों ने हाईकोर्ट में चुनौती।
कोर्ट ने पाया कि मृतक कुंजल प्रसाद के बेटे और एक अन्य चश्मदीद ने गवाही दी थी। बताया था कि आरोपियों ने करीब सात से 10 कदम की दूरी से केवल तीन गोलियां चलाई थीं। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मृतक के शरीर पर चार अलग-अलग गोलियों के घाव थे। यह भी पाया गया कि घाव नंबर एक चार फीट के भीतर से सटाकर मारी गई गोली का था। ऐसे में गवाहों की ओर बताई गई दूरी के दावे को पूरी तरह झूठे साबित हुए। हाईकोर्ट ने इस वैज्ञानिक तथ्य को नजरअंदाज करने से इन्कार कर दिया। हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट की ओर से 1987 में दी गई दोषसिद्धि को रद्द कर अपीलकर्ता जगदीश को सभी आरोपों से बरी कर दिया।