गन्ना किसानों को विलंब से बकाए का भुगतान करने के बाद उनको मिलने वाला ब्याज माफ करने पर हाईकोर्ट ने प्रदेश सरकार से जवाब मांग लिया है। कोर्ट ने पूछा है कि क्या सरकार को ब्याज माफ करने का अधिकार है। किस कानून के तहत ब्याज माफ किया गया है। किसान मजदूर संगठन की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति वीके शुक्ला और न्यायमूर्ति एमसी त्रिपाठी की खंडपीठ ने यह आदेश दिया है।
याचिका पर संगठन के संयोजक वीएम सिंह ने पक्ष रखा। उन्होंने कोर्ट को बताया कि वर्ष 2012 से लेकर 2016 तक चीनी मिलें और सरकार गन्ना किसानों के भुगतान को लेकर हीलाहवाली करती रही हैं। किसानों को विलंब से भुगतान किया गया वो भी तब जब हाईकोर्ट सख्त हुआ। विलंब से भुगतान होने की स्थिति में किसानों को 15 प्रतिशत ब्याज पाने का हक है, मगर प्रदेश सरकार ने सत्र 2012, 2013, 2014 और 2015 का ब्याज माफ कर दिया है, जबकि सरकार के पास ऐसा करने का अधिकार नहीं है। हाईकोर्ट ने भी 24 मई 2016 के आदेश में कहा है कि ब्याज देना होगा। सुप्रीमकोर्ट का आदेश है कि ब्याज माफ नहीं किया जा सकता है। प्रदेश सरकार को ब्याज में माफी देने का अधिकार नहीं है। बैंक किसानों को परेशान कर रहे हैं और सरकार ब्याज माफ कर चीनी मिलों को फायदा पहुंचा रही है। 40 मिलों का ब्याज सरकार ने माफ कर दिया है।
यदि उनको ब्याज माफ करना ही है तो उन किसानों का कर्ज पर ब्याज माफ करें जो सूखे और ओलावृष्टि से पीड़ित हैं। मुख्य स्थायी अधिवक्ता रमेश उपाध्याय ने आपत्ति जताई कि याचिका में ब्याज माफी के आदेश को चुनौती नहीं दी गई है। कोर्ट ने याची से कहा है कि वह संपूरक हलफनामे के साथ ब्याज माफी के आदेश को चुनौती दे सकते हैं। याचिका पर 24 अगस्त को अगली सुनवाई होगी।