इलाहाबाद। तीन चौथाई शताब्दी से ज्यादा बीत जाने के बावजूद कलम के सिपाही मुंशी प्रेमचंद की कालजयी कृति ‘गोदान’ की लोकप्रियता, प्रासंगिकता, प्रामाणिकता में रत्ती भर भी कमी नहीं आई है। राष्ट्रीय स्तर पर किसानों की समस्या को लेकर अपने काल को भेदने वाली गोदान जितनी प्रामाणिक कृति दूसरी नहीं। स्थितियां बहुत कुछ बदली हैं लेकिन बदलाव की बयार के बीच होरी, धनिया, घीसू, माधव बदले हुए रूप में हमारे बीच आज भी हैं। यही वजह है कि मौजूदा दौर के सवालों को भी सलीके से उकेरते, सहेजते प्रेमचंद आज भी प्रासंगिक हैं।
भारत भारती पुरस्कार से सम्मानित वरिष्ठ कथाकार दूधनाथ सिंह कहते हैं, प्रेमचंद के समाज का तकनीकी विकास जरूर हुआ है, जैसे हल-बैल की जगह ट्रैक्टर है तो कृषि, सिंचाई के साधन बदले हैं, भूमिहीन किसानों में क्रांतिकारी चेतना भी विकसित हुई है, बावजूद इसके आज खेतिहर किसानों की हालत और बदतर हुई है। खेती अलाभकारी स्थिति में है। शोषक और शोषित के बीच का रिश्ता कमोबेश वैसा ही है। तब महाजन, सूदखोर थे, मौजूदा बैंकिंग व्यवस्था बड़े सूदखोर के रूप में विकसित हुई है। बीते वर्ष 11 हजार किसानों ने आत्महत्या की। प्रेमचंद का होरी अंतिम समय में अपने खेत पर ही मजदूरी करता है लेकिन आत्महत्या नहीं।
वरिष्ठ कथालेखिका प्रोफेसर अनीता गोपेश कहती हैं, आज समाज बहुत बदल गया है। भटकाव, प्रलोभन बहुत ज्यादा है। किसानों की हालत पहले से ज्यादा बदतर हुई है। पूंजीवादी व्यवस्था से लड़ाई आज भी है लेकिन अंग्रेजों नहीं अपनों से ही। हम फासिज्म की ओर बढ़ रहे हैं। प्रेमचंद ने जिन मूल्यों को तरजीह दी, आज उनकी बात करना हास्यास्पद माना जाता है। आज एक प्रेमचंद से काम नहीं चलेगा, कई प्रेमचंद चाहिए क्योंकि वह पहले से कहीं ज्यादा प्रासंगिक हो गए हैं।
वरिष्ठ साहित्यकार अजामिल कहते हैं, प्रेमचंद का समय आज नए चोले में है अनेक चुनौतियों, सवालों के साथ। समाज के मूल्य और शोषण की परिभाषा बदल गई है। पहले साहूकार, जमींदार थे, अब मल्टीनेशनल हैं। प्रेमचंद ने बहुत दूर जाकर समय की पड़ताल की थी। यही वजह है कि मौजूदा दौर के हर कदम पर प्रेमचंद शिद्दत के साथ दस्तक देते हैं।
जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर बद्री नारायण का मानना है कि स्थितियों में निश्चित रूप से परिवर्तन आया है, तभी समाज के निचले तबके के लोग भी सत्ता पर काबिज हैं लेकिन अब भी घीसू, माधव की बड़ी संख्या समाज में है। मशहूर आलोचक प्रोफेसर एए फातमी कहते हैं, भारतीय समाज की संरचना जरूर बदली है, लेकिन शोषण की बदसूरत शक्ल के साथ। आम आदमी और किसान पहले से ज्यादा परेशान है। तरक्की के नाम पर जो तब्दीली हो रही है, उसमें किसान ही मारा जा रहा है। ऐसे में जब मूल्यों, सरोकारों का बदलाव चौंकाता है, प्रेमचंद की जरूरत पहले से ज्यादा बढ़ जाती है।