गंगा-जमुनी तहजीब रस्म नहीं, बल्कि एक आत्म शक्ति है, जिसे आचरण में इस्तेमाल किया जाना चाहिए
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नवाब की जमानत अर्जी मंजूर करते कई विचारकों के कथनों को भी उद्धत किया है। कहा कि गंगा-जमुनी तहजीब बातचीत में मनाई जाने वाली रस्म नहीं है बल्कि वास्तव में यह एक आत्म शक्ति है, जिसे आचरण में इस्तेमाल किया जाना चाहिए। गंगा-जमुनी तहजीब मतभेदों को सहन करने मात्र के लिए नहीं है बल्कि विविधता का हार्दिक आलिंगन है।
यह उत्तर प्रदेश राज्य का लोकाचार, भारतीय दर्शन की कैथोलिकता को सामने लाता है। कोर्ट ने अपने आदेश में अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रॉबर्ट्स और वारेन के कथनों को भी बयां किया है। कोर्ट ने कहा कि अदालतों में कानूनी संवाद भी समाज में विकृत प्रवृत्तियों को रोकने में मदद कर सकते हैं। हिंसा की घटनाएं समाज में असंतोष फैलाती हैं, जो कानून के शासन के साथ असंगत हैं और किसी भी सभ्य राष्ट्र में इसका कोई स्थान नहीं है।
कानून अपना काम करेगा और अपराधियों को न्याय का सामना करना पड़ेगा। कोर्ट ने कहा कि सांप्रदायिक हिंसा से शांति भंग होती है और समाज में दरार आती है। लोकतंत्र के लिए राजनीति अनिवार्य है लेकिन राजनीति संवाद पर एकाधिकार नहीं कर सकती। समस्या से निपटने के लिए कानून और अदालत ही एकमात्र साधन नहीं हैं। समाज के सभी वर्गों को सभी नागरिकों के बीच भाईचारे को बढ़ावा देने और शांति सुनिश्चित करने के लिए अपनी जिम्मेदारियों को निभाना होगा। कोर्ट ने अपने आदेश में महात्मा गांधी को भी याद किया है।
कहा है कि गांधी जी ने प्रेम को सभी धर्मों का सार बताया है। कहा कि कई पीढ़ियों ने गुलामी की बेड़ियों से आजादी पाने के लिए अपना खून, पसीना, आंसू और परिश्रम दिया है। संस्थापक पीढ़ियों ने संघर्षों के जरिये देश को आगे बढ़ाया था। इसलिए सभी भारतीयों का कर्तव्य है कि देश को शांत बंदरगाहों में बदल दें। कोर्ट ने कवि प्रदीप की कविता हम लाए हैं, तूफान से किश्ती निकाल के... को भी उद्धत किया है।