नौटंकी के मंच से संबोधित करते थे प.नेहरू
लोकनाट्य में जनभागीदारी को देखते हुए जंग-ए-आजादी के दौर में पं. जवाहर लाल नेहरू नौटंकी खत्म होने के बाद सुबह मंच पर जाकर जनता को संबोधित करते थे। जनता को शोषण के खिलाफ आवाज उठाने के लिए प्रेरित करते थे।
मंडली के साथ रहे लाल बहादुर शास्त्री
एक आंदोलन के दौरान जब अंग्रेजों की सरकार लाल बहादुर शास्त्री को खोज रही थी, तब नौटंकी मंडली के साथ रहकर शास्त्री जी ने करीब दो महीने बिताए थे। इस दौरान उन्होंने कई स्थान बदले।
किस्सा शहजादी नौटंकी का
शहजादी नौटंकी मुल्तान के एक बादशाह की बेटी का नाम था। वह फूल की तरह थी, उसे फूलों से तौला जाता तो कभी नौ टका (सिक्कों) से भी। इस किस्से की नाटकीय प्रस्तुति से नौटंकी नाम प्रचलन में आ गया। लोकनाट्य के शिल्पकार राजकुमार श्रीवास्तव और कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय की डॉ. हैन्सन कैथरीन ने इसका उल्लेख अपने शोध में किया है।
हबीबुन बाई को कोकिला का खिताब
इलाहाबाद (प्रयागराज) में 1934-35 के आसपास नौटंकी में हबीबुन का पहली महिला कलाकार के रूप में प्रवेश हुआ। हालांकि, वह बहराइच, लखनऊ, सीतापुर क्षेत्र में पहले से अभिनय कर रही थीं। यहां एक प्रतियोगी प्रस्तुति में हार के बाद वह यहीं की हो गईं। उनके गायन से प्रभावित होकर नेहरू ने उन्हें कोकिला बाई का खिताब दिया था।
नृत्य पर पैसा गिरने लगा और चोट कला को पहुंची
नौटंकी के ताजा हालात पर स्वर्ग रंगमंडल के निर्देशक अतुल यदुवंशी कहते हैं कि भले ही इस कला को फूहड़ बनाने की कोशिश की गई लेकिन कामयाब नहीं हुई। उन्होंने बताया कि सीन बदलने के कुछ तैयारियां की जाती हैं। ऐसे में दर्शकों को बांधे रखने के लिए नृत्य का आयोजन होता है। हुआ यह कि इस दौरान लोग मंच पर पैसे फेंकने लगे। इससे आयोजकों को लगा कि नृत्य कुछ देर को बढ़ा दिया। इस तरह के प्रयासों से फूहड़ता का प्रवेश होने लगा। लेकिन ऐसा कुछ ही जगहों पर होता है। आज भी सीरियस नाटक हो रहे हैं, जो पसंद किए जा रहे हैं। वह बताते हैं कि वर्ष 2004 में जब पाकिस्तान के लौहार में उन्होंने बंटवारे की आग नाटक प्रस्तुत किया तो दर्शकों ने बहुत सराहा। कहानी तो दो भाइयों की बीच की थी, पर जनता को संदेश समझ में आ ही गया कि यह दो भाई नहीं, दो देश हैं।
मौलिकता को बचाना बड़ी चुनौती
हिंदी रंगमंच के विकास पर शोध कर रहे ईश्वर शरण डिग्री कॉलेज के छात्र रत्नेश कुमार कहते हैं कि सिनेमा के विभिन्न रूपों की छाया लोकनाट्य पर पड़ रही है। अच्छी सामग्री को अपनाने से गुरेज नहीं करना चाहिए। बशर्ते वह लोक कला की मौलिकता को नुकसान न पहुंचाए। यह एक बड़ी चुनौती है।