हाईकोर्ट ने कहा है कि अपने अधिकारों के प्रति लापरवाह व्यक्ति को कोर्ट से राहत नहीं मिल सकती है। जमीन अधिग्रहण के मुआवजे का अवार्ड घोषित होने के 28 साल बाद बढ़े मुआवजे के लिए अपील दाखिल करना यह बताता है कि अपील बिना किसी वैधानिक कारण के दाखिल की गई है। कोर्ट ने कहा कि अपील दाखिल होने विलंब का यदि उचित कारण बताया जाता है तो उस सुनवाई की जा सकती है। मियाद तय करने का उद्देश्य पक्षकारों के अधिकारों को नष्ट करना नहीं बल्कि समय सीमा के भीतर अपील का नियम तय करना है।
यह अपील ऐसे व्यक्ति ने दाखिल की है जिसका अधिग्रहण के समय जन्म भी नहीं हुआ था जबकि उसने कोर्ट में हलफनामा दाखिल किया है कि उसे तथ्यों की व्यक्तिगत जानकारी है। बिना तथ्यों और वैधानिक कारण के अपील दाखिल करने पर अदालत ने याचिका दाखिल करने वालों (मृतक याचियों को छोड़कर) पर पांच हजार रुपये का हर्जाना लगाया है। हर्जाने की रकम एक माह में अपीलार्थियों से वसूलकर विधिक सेवा प्राधिकरण में जमा कराने का निर्देश दिया है। इस मामले में हरी सिंह (मृतक) और 52 अन्य की ओर से कुल चार अपीलें हाईकोर्ट में दाखिल की गई थी।
इन अपीलों पर एक अपीलार्थी के वारिस सुभाष चंद्र उर्फ सुभाष भाटी ने हलफनामा दाखिल कर दावा किया था कि सभी तथ्य उसकी निजी जानकारी में हैं। मामला नोएडा के शहदरा गांव में मुख्य नाले के लिए 1979 में अधिग्रहीत भूमि का है। इसका मुआवजा 4086 रुपये प्रति बीघा तय किया गया था। जिसके खिलाफ किसानों ने मुआवजा अधिकरण में अपील की। अधिकरण ने दस हजार रुपये प्रति बीघा मुआवजा तय करते हुए नौ प्रतिशत ब्याज भी देने का आदेश दिया था। इसके 28 साल बाद यह कहते हुए हाईकोर्ट में अपील दाखिल की गई कि दूसरे गांवों की जमीन पर हाईकोर्ट ने 297 रुपये प्रति वर्गगज मुआवजा देने का आदेश दिया है इसलिए उनको भी इसी दर से मुआवजा दिया जाए।