इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के चुनाव के खिलाफ अनुच्छेद 226 के अंतर्गत अधिकार पृच्छा (को-वारंटो) याचिका पोषणीय नहीं है। जनप्रतिनिधि के चुनाव लड़ने की अहर्ता एवं पद धारण करने की योग्यता को चुनाव याचिका दायर कर ही चुनौती दी जा सकती है।
कोर्ट ने कहा है कि संविधान के अनुच्छेद 243(जेड)( जी ) एवं उ प्र पंचायत राज एक्ट की धारा 6ए के अनुसार जनप्रतिनिधियों के चुनाव को सक्षम अधिकारी /कोर्ट में ही चुनौती दी जा सकती है। अन्य किसी अदालत में चुनौती देने को वर्जित किया गया है। इसी के साथ कोर्ट ने हापुड़ के गोहटा आलमगीरपुर के ग्राम प्रधान के खिलाफ अधिकार पृच्छा याचिका जारी करने से इंकार कर दिया है।
कोर्ट ने कहा है कि चूंकि चुनाव याचिका दाखिल करने का विकल्प उपलब्ध है, इसलिए अन्य कोई याचिका पोषणीय नहीं है। यह आदेश न्यायमूर्ति बी के नारायण तथा न्यायमूर्ति प्रकाश पाडिया की खंडपीठ ने गांव के निवासी ज्ञानवीर सिंह की,याचिका को खारिज करते हुए दिया है।
याचिका में कहा गया था कि ग्राम प्रधान संचित पद धारण करने योग्य नहीं है, क्योंकि वह गांधी स्मारक इंटर कालेज हापुड़ में सहायक लिपिक है।सरकार से वेतन पा रहा है। बिना इस्तीफा दिए ग्राम प्रधान चुने गए और पद पर बने हुए हैं। जो कानून के तहत निर्योग्यता है।बिना अधिकारिता के ग्राम प्रधान पद धारण करने पर अधिकार पृच्छा याचिका जारी कर पद से हटाया जाय।
ग्राम प्रधान की तरफ से याचिका की ग्राह्यता पर आपत्ति की गयी और कहा गया कि कोर्ट को याचिका सुनने का अधिकार नही है। जिसे स्वीकार करते हुए कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी है।