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High Court : बेगुनाही के लिए लूट के मुकदमे में कटी जवानी, बुढ़ापे में बरी

Wed, 01 Jul 2026 10:49 AM IST
विनोद सिंह सुनील यादव, प्रयागराज

सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लूट के मुकदमे में जवानी काट चुके दो दोषियों को बुढ़ापे में बरी कर दिया। हमीरपुर की जिला अदालत से हाईकोर्ट तक करीब 40 साल चली कानूनी लड़ाई के दौरान सह-आरोपी अश्वनी जिंदगी हार गए।
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अदालत का फैसला। - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लूट के मुकदमे में जवानी काट चुके दो दोषियों को बुढ़ापे में बरी कर दिया। हमीरपुर की जिला अदालत से हाईकोर्ट तक करीब 40 साल चली कानूनी लड़ाई के दौरान सह-आरोपी अश्वनी जिंदगी हार गए। सजा के खिलाफ केस दाखिल करने वाले वकील की दूसरी पीढ़ी ने मुकदमे की इतिश्री कराई।

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दो फरवरी 1987 को कथित लूट में तीन युवकों को सात साल की सुनाई गई। उस आदेश के खिलाफ अश्वनी, वासदेव और कल्लू ने 31 दिसंबर 1987 को हाईकोर्ट मेंं अपील दाखिल की। दो जनवरी 1988 को पहली सुनवाई के साथ शुरू हुआ तारीख पे तारीख का दौर जून 2026 में थमा। न्यायमूर्ति संतोष राय की एकल पीठ ने वासदेव और कल्लू को ट्रायल कोर्ट से मिली सजा रद्द कर दी। 65 के हो चुके वासदेव अब बिस्तर पर हैं और कल्लू 70 की उम्र पार कर रहे हैं। संवाद

क्या था मामला

मामला छह जनवरी 1986 का है। आरोप लगा कि मुद्दई (शिकायतकर्ता) राजाराम और उनके 14 साथी ट्रैक्टर पर सवार होकर सुमेरपुर मंडी से अपने गांव किशवाही लौट रहे थे। शाम सात बजे चार हथियारबंद बदमाशों ने ट्रैक्टर रुकवाया और यात्रियों का सामान लूट लिया। पुलिस ने मामले में अश्वनी, वासदेव और कल्लू को नामजद किया था। विशेष अदालत ने तीनों को दोषी मानते हुए सात साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। मामले में चौथे आरोपी का पता नहीं लगा।

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पुलिस की कहानी में चूक

1.एफआईआर में देरी

कोर्ट ने पाया के पुलिस की डायरी में रिपोर्ट 40 दिन बाद लिखी गई। इसका कोई तार्किक कारण नहीं बताया गया। आरोपी और शिकायतकर्ता एक ही गांव के थे। इसके बावजूद रिपोर्ट में देरी रंजिश प्रतीत होती है। कोर्ट ने इसे साजिश और रंजिश का बड़ा सबूत माना।

2.बड़ी लूट का दावा, बरामदगी कुछ नहीं

अभियोजन ने लूट की बड़ी घटना का दावा किया था, लेकिन पुलिस की तलाशी में आरोपियों के पास से लूटा गया एक भी समान बरामद नहीं हुआ।

3.पहचान पर संदेह

कोर्ट ने पाया कि घटना रात के अंधेरे में हुई थी। ऐसे में आरोपियों को कैसे पहचाना गया, पुलिस साबित करने में विफल रही। कोर्ट ने ट्रैक्टर की क्षमता पर भी सवाल उठाए।
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कोर्ट की टिप्पणी

ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्यों का मूल्यांकन करते समय न्यायिक विवेक का सही प्रयोग नहीं किया। केवल नामजदगी के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। अभियोजन आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा। - इलाहाबाद हाईकोर्ट

पिता की दाखिल अपील, बेटे ने निस्तारित कराई

हाईकोर्ट पहुंचे तीनों मुल्जिमों की ओर से 1987 में अपील दाखिल करने वाले अधिवक्ता कमलेश्वर सिंह भी दुनिया में नहीं रहे। इसके बाद कोर्ट ने मुकदमे की पैरवी के लिए विजेता गुप्ता को न्याय मित्र नियुक्त किया। अंतत: कमलेश्वर की दूसरी पीढ़ी के वकील उनके बेटे गोपाल सिंह ने अपील में बहस की और निस्तारण कराया।
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