याचियों का कहना था कि इस शासनादेश से उन अध्यापकों का भविष्य प्रभावित होगा जो की प्राथमिक या उच्च प्राथमिक में प्रधानाध्यापक होने वाले हैं। तथा जो पहले से प्रधानाध्यापक थे और अब जूनियर हो गए। यह भी कहा गया कि विद्यालयों को एकीकृत करने का कोई प्रावधान उपलब्ध नहीं है। मगर ऐसा कोई प्रावधान प्रस्तुत नहीं किया जा सका जिसमें विद्यालयों को एकीकृत करने पर रोक हो।
कोर्ट ने कहा कि ऐसा कोई तर्क प्रस्तुत नहीं किया जा सका कि यह निर्णय छात्रों के हित में नहीं है। कोर्ट ने कहा कि संविलियन से उच्च प्राथमिक के अध्यापकों के अनुभव का लाभ सभी छात्रों को मिल सकेगा।
वहीं, इस दौरान याचिका 5324/2019 के अधिवक्ता अजय कुमार श्रीवास्तव ने पक्ष रखते हुए कहा कि दो विद्यालयों के विलय के पश्चात केवल एक ही प्रधानाध्यापक विलयित विद्यालय का प्रशासन देखेगा। शासनादेश में दूसरे प्रधानाध्यापक की भूमिका परिभाषित नहीं है। आगे कहा कि शासनादेश के पैरा 2 एवं 10 विरोधाभासी हैं। इस शासनदेश से प्रधानाध्यापक का पद अवनत किया जाता है।
इस पर कोर्ट ने प्रदेश सरकार को एक कमेटी गठित कर शासनादेश का सही तरीके से अनुपालन करने का निर्देश दिया है। विशेष कर पैरा 10 का जिसमें कि कहा गया है कि संविलियन के उपरांत पूर्व से सृजित अध्यापक और प्रधानाध्यापक के पद यथावत बने रहेंगे। कोर्ट ने यह कार्य वर्ष 2025 / 26 का सत्र शुरू होने से पूर्व करने का निर्देश दिया है।