इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि मुस्लिम कानून के तहत तलाक की डिक्री केवल एक घोषणात्मक प्रकृति की होती है, जो पहले दिए जा चुके तलाक की वैधता को स्वीकार करती है। ऐसी डिक्री तलाक की नई तारीख तय नहीं करती, बल्कि यह बताती है कि तलाक पहले ही प्रभावी हो चुका था। यह टिप्पणी न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह की एकल पीठ ने प्रयागराज निवासी हुमैरा रियाज की ओर से दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका की।
हुमैरा ने परिवार न्यायालय में भरण-पोषण के लिए आवदेन किया था। कोर्ट ने आवेदन को इस आधार पर खारिज कर दिया था कि उसकी दूसरी शादी के समय पहले पति से तलाक की अदालती डिक्री प्राप्त नहीं हुई थी। इससे उसकी दूसरी शादी शून्य मानी गई। ऐसे में उसे भरण-पोषण का अधिकार नहीं है। इस फैसले को याची ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।
कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता के पहले पति ने 2005 में ही तलाक दे दिया था, जिसे बाद में 2013 में परिवार न्यायालय ने केवल प्रमाणित किया। सीआरपीसी की धारा-125 एक लाभकारी प्रावधान है, जिसका उद्देश्य महिलाओं को बेसहारा होने से बचाना है। इसे तकनीकी आधारों पर खारिज नहीं किया जाना चाहिए। कोर्ट ने परिवार न्यायालय के पुराने आदेश को आंशिक रूप से रद्द कर दिया। कहा कि छह महीने में महिला के भरण-पोषण के दावे पर नए सिरे से निर्णय लिया जाए।