इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि सेवा के अंतिम दौर में किसी कर्मचारी की नियुक्ति को समाप्त करना न्यायहित में नहीं होगा। खासकर जब नियुक्ति के समय सभी तथ्य विभाग के संज्ञान में रहे हों और 25 साल तक बिना आपत्ति सेवा ली गई हो।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि सेवा के अंतिम दौर में किसी कर्मचारी की नियुक्ति को समाप्त करना न्यायहित में नहीं होगा। खासकर जब नियुक्ति के समय सभी तथ्य विभाग के संज्ञान में रहे हों और 25 साल तक बिना आपत्ति सेवा ली गई हो।
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यह टिप्पणी न्यायमूर्ति सौमित्र दयाल सिंह और न्यायमूर्ति स्वरूपमा चतुर्वेदी की खंडपीठ ने राज्य सरकार की ओर से दायर विशेष अपील पर की। मंजू कुशवाहा की नियुक्ति 2000 में फर्रुखाबाद के संकिसा में अल्पसंख्यक संस्थान में सहायक अध्यापिका के पद पर नियमित चयन प्रक्रिया के तहत की गई थी। नियुक्ति को जिला विद्यालय निरीक्षक की स्वीकृति भी मिली थी। 15 साल तक उनकी सेवा पर कोई आपत्ति नहीं उठाई गई।
आरोप था कि बाद में एक पूर्व विधायक की शिकायत पर यह कहते हुए नियुक्ति रद्द कर दी गई कि उनके पति उसी संस्थान के प्रधानाचार्य थे। नियुक्ति निरस्तीकरण के आदेश को मंजू ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, जहां उन्हें एकल पीठ से अंतरिम राहत मिली और वह लगातार सेवा करती रहीं।
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कोर्ट ने कहा कि विभाग को नियुक्ति के समय सभी तथ्यों की जानकारी थी। इसके बावजूद 15 वर्ष बाद कार्रवाई की गई। ऐसे में राज्य अधिकारियों की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। शिक्षक अब 56 वर्ष की हैं, उनकी सेवा के केवल कुछ वर्ष ही शेष हैं। ऐसे में नियुक्ति समाप्त करना न्याय के उद्देश्य के विपरीत होगा। कोर्ट ने राज्य सरकार की विशेष अपील खारिज कर दी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह आदेश मामले की विशेष परिस्थितियों को देखते हुए दिया गया है। इसे अन्य मामलों में नजीर नहीं माना जाएगा।