मानसिक आयु निर्धारण के लिए की गई जांच में उसकी आयु छह वर्ष आंकी गई। कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे यह पता चले कि किशोर के अंदर आदतन अपराध करने की प्रवृत्ति है। सिर्फ इसलिए कि उसने एक जघन्य अपराध किया है, उसे एक वयस्क के बराबर नहीं रखा जा सकता। एकल न्यायाधीश ने निर्देश दिया कि याची पर किशोर न्याय बोर्ड की ओर से एक किशोर के रूप में मुकदमा चलाया जाए।
निर्भया का केस एक अपवाद : हाईकोर्ट
अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल जघन्य अपराध करने से ही किशोर पर वयस्क की तरह मुकदमा चलाने का अधिकार नहीं मिल जाता। निर्भया मामला एक अपवाद था, यह सामान्य नियम नहीं है। सभी किशोरों पर वयस्कों की तरह मुकदमा नहीं चलाया जा सकता जब तक कि उनके मानस पर पड़ने वाले समग्र सामाजिक और मनोवैज्ञानिक प्रभावों पर उचित विचार न किया जाए।