इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि आरोप प्रथम दृष्टया असामान्य, अप्राकृतिक या परस्पर विरोधाभासी प्रतीत हों तो केवल शिकायतकर्ता और गवाहों के बयानों के आधार पर समन आदेश पारित करना उचित नहीं है। ऐसे मामलों में कोर्ट को सीआरपीसी की धारा-202(1) के तहत जांच आवश्यक है।
यह आदेश न्यायमूर्ति अनिल कुमार-दशम की एकल पीठ ने रमेश यादव की याचिका पर दिया। याची ने 30 जून 2025 को पुनरीक्षण न्यायालय तो 19 सितंबर 2022 को गोरखपुर के एसीजेएम की ओर से पारित समन आदेश को चुनौती दी थी। अधिवक्ता ने दलील दी कि शिकायतकर्ता की ओर से लगाए गए छेड़छाड़ व मारपीट के आरोप विरोधाभासी और मनगढ़ंत हैं। एसपी को दिए गए प्रार्थना पत्र और न्यायालय में दाखिल शिकायत में घटनाक्रम अलग-अलग बताया गया है, जिससे आरोपों की विश्वसनीयता संदिग्ध हो जाती है।
शिकायतकर्ता के अधिवक्ता ने दलील दी कि कोई सिविल विवाद नहीं है। शिकायतकर्ता व उसके गवाहों ने आरोपों का समर्थन किया है। निचली अदालतों ने तथ्यों का सही मूल्यांकन किया है। इसलिए आदेशों में कोई त्रुटि नहीं है। कोर्ट ने पुनरीक्षण न्यायालय का 30 जून 2025 का आदेश और मजिस्ट्रेट का 19 सितंबर 2022 का समन आदेश रद्द कर दिया। साथ ही ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि सीआरपीसी की धारा 202(1) के तहत जांच रिपोर्ट मंगाए और उसके बाद नया आदेश पारित करें।
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इसके तहत मजिस्ट्रेट किसी शिकायत पर संज्ञान लेने के बाद आरोपी के खिलाफ समन जारी करने के आदेश को स्थगित कर सकते हैं। मामले की सच्चाई जानने के लिए स्वयं या पुलिस के माध्यम से जांच करा सकते हैं।