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हाईकोर्ट : सिर पर लोहे की रॉड से हमले की कहानी, पोस्टमार्टम में मिले आरपार हुई गोली के निशान

Sun, 23 Aug 2026 05:23 AM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 12 साल पहले वाराणसी में हुई हत्या के मामले में अभियोजन की कहानी और सामने आए सुबूतों को लेकर हैरानी जताई। कोर्ट ने पाया कि पुलिस की कहानी में मृतक के सिर पर आईं चोट लोहे की रॉड से हमले की बताई गईं।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 12 साल पहले वाराणसी में हुई हत्या के मामले में अभियोजन की कहानी और सामने आए सुबूतों को लेकर हैरानी जताई। कोर्ट ने पाया कि पुलिस की कहानी में मृतक के सिर पर आईं चोट लोहे की रॉड से हमले की बताई गईं, जबकि पोस्टमार्टम में सिर से गोली के आर-पार होने के निशान मिले। बरामद हथियार पर मिले खून मृतक के ही थे, यह बताने में पुलिस नकाम रही। इसके बावजूद सत्र न्यायालय ने पांच आरोपियों को दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुना दी।

कोर्ट ने कहा कि यह मामूली अंतर नहीं, हमले के हथियार और तरीके से जुड़ा विरोधाभास है। मामले की सुनवाई कर रही न्यायमूर्ति सिद्धार्थ वर्मा, न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ ने आरोपी रोहित सिंह, मंटू उर्फ मनीष पांडेय, आशीष सिंह, दीपु सिंह उर्फ बॉक्सर और आशुतोष पांडेय की अपील स्वीकार कर ली। साथ ही उन्हें उम्रकैद से बरी कर जेल में बंद रोहित सिंह और आशीष सिंह को तत्काल रिहा करने का आदेश दिया है।

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वहीं, स्पष्ट किया कि मंटू उर्फ मनीष पांडेय, दीपु सिंह उर्फ बॉक्सर और आशुतोष पांडेय पहले से जमानत पर थे। इसलिए उन्हें आत्मसमर्पण नहीं करना होगा। अभियोजन के अनुसार 22 मई 2014 को चोलापुर क्षेत्र में सोनू उर्फ मोहम्मद मुश्ताक पर आरोपियों ने हमला किया था। आरोप था कि आशीष और रोहित ने लोहे की रॉड से उसके सिर पर वार किए, जबकि मंटू, आशुतोष हथियार लेकर खड़े थे और अन्य आरोपियों को हत्या के लिए उकसा रहे थे।

इलाज के दौरान 25 मई को सोनू की मौत हो गई। इसके बाद सत्र अदालत ने रोहित सिंह, मंटू उर्फ मनीष पांडेय, आशीष सिंह, दीपु सिंह उर्फ बॉक्सर और आशुतोष पांडेय को दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुना दी। फैसले के खिलाफ सभी ने हाईकोर्ट में अपील दाखिल की। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि घटना के करीब दो घंटे बाद दर्ज एफआईआर पुलिस कांस्टेबल ने लिखी थी। घायल को पहले थाने ले जाया गया और उसके बाद ईलाज के लिए भेजा गया। कोर्ट ने माना कि दो घंटे की देरी अपने आप में असामान्य नहीं है। घायल को अस्पताल से पहले थाने पर ले जाने की पुलिस संतोषजनक सफाई नहीं दे सकी।

मेडिकल रिपोर्ट ने बदली पूरी तस्वीर

घटना के करीब दो घंटे बाद निजी अस्पताल के डॉक्टर ने घायल की जांच की थी। रिपोर्ट में सिर सहित चार चोटें कठोर व कुंद वस्तु से लगी बताई थी।इसमें गोली के आर-पार होने का कोई जिक्र नहीं था। वहीं, पोस्टमार्टम रिपोर्ट में सिर की दाहिनी हड्डी में गोली के प्रवेश और दाहिनी आंख के ऊपरी हिस्से से निकलने का घाव मिला। पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर ने गवाही में भी स्पष्ट कहा कि गोली सिर में प्रवेश कर आंख के रास्ते बाहर निकली थी। कोर्ट ने माना कि अभियोजन की ओर से निजी अस्पताल के इलाज के रिकॉर्ड और डॉक्टर को बतौर गवाह पेश नहीं करना संदेहास्पद है। यह लक्षण इशारा कर रहे है कि पुलिस कोई महत्वपूर्ण साक्ष्य छिपा रही है।
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हथियार बरामद पर फॉरेंसिक रिपोर्ट नहीं आई

कोर्ट ने पाया कि पुलिस ने आरोपियों की निशानदेही पर लोहे की रॉड बरामदगी का दावा किया पर कोई स्वतंत्र गवाह पेश नहीं किया। साथ ही हथियार और खून लगी मिट्टी फॉरेंसिक जांच के लिए भेजे जाने के बावजूद यह साबित करने के लिए कोई एफएसएल या सीरोलॉजी रिपोर्ट अदालत में पेश नहीं की गई कि बरामद हथियारों पर मिला खून मृतक का था।

ट्रायल में नहीं पेश किए गए कई गवाह

कोर्ट ने यह भी पाया कि पुलिस ने ट्रायल के दौरान मृतक को भाई को चश्मदीदी के रूप में पेश किया। इसके अलावा कोई स्वतंत्र गवाह पेश नहीं किए जा सके, जबकि अभियोजन के अनुसार घटना के वक्त परिवार और गांव के लोग मौके पर पहुंच गए थे।

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