इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि गिरफ्तारी के समय तैयार किए गए रिकवरी मेमो में बरामद वस्तुओं का विवरण और संबंधित धाराएं दर्ज थीं, जिसे अभियुक्त को पढ़कर सुनाया गया था। उसने स्वेच्छा से उस पर हस्ताक्षर किए हैं। ऐसे में यह माना जाएगा कि अभियुक्त को गिरफ्तारी के कारणों की वास्तविक जानकारी थी।
कोर्ट ने कहा कि गिरफ्तारी मेमो में आधार का उल्लेख न होना केवल एक प्रक्रियात्मक अनियमितता है न कि ऐसी गंभीर कमी, जिससे रिमांड आदेश रद्द किया जा सके। साथ ही फर्जी डिग्री के अपराध को गंभीर बताते हुए कहा कि यह केवल किसी एक व्यक्ति को नुकसान पहुंचाने वाला नहीं है, बल्कि समाज और राष्ट्र की शैक्षणिक-पेशेवर व्यवस्था की जड़ों को कमजोर करता है।
ऐसे अपराधों से अयोग्य लोग सार्वजनिक विश्वास और जिम्मेदारी के पदों तक पहुंच जाते हैं, जो व्यापक सामाजिक नुकसान का कारण बनता है। हाईकोर्ट ने रिकवरी मेमो को ही गिरफ्तारी के तथ्यात्मक व कानूनी आधार की लिखित-प्रभावी सूचना मानते हुए याचिका खारिज कर दी। साथ ही उसे अंतरिम जमानत देने से भी इन्कार कर दिया।