संविधान सभी को स्वतंत्रता देता है लेकिन इसकी एक स्पष्ट सांविधानिक सीमा है
कोर्ट ने कहा कि भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण सभा का अधिकार देता है, लेकिन इसकी स्पष्ट सांविधानिक सीमाएं हैं। जब कोई भीड़ कानून को अपने हाथ में लेकर किसी व्यक्ति के लिए सिर कलम करने जैसे मृत्युदंड की मांग करती है तो यह सीधे तौर पर कानून के शासन का अपमान है। कोर्ट ने कहा कि इस्लाम धर्म के नाम पर लगाए जाने वाले ऐसे हिंसक नारे वास्तव में पैगंबर मोहम्मद के आदर्शों के भी विपरीत हैं।
आदेश में कहा गया कि पैगंबर मोहम्मद ने अपने जीवन में अपमान और कष्ट सहने के बावजूद दया, करुणा और क्षमा का मार्ग अपनाया। न्यायालय ने एक घटना का उल्लेख करते हुए कहा कि पैगंबर मोहम्मद ताइफ शहर गए। वहां उनकी एक गैर-मुस्लिम पड़ोसी रहती थी, जो अक्सर उनके रास्ते में कूड़ा फेंककर परेशान करती थी, लेकिन पैगंबर ने कभी भी पलटवार नहीं किया।
धार्मिक नारे जब तक उकसाने के लिए न लगाए जाएं अपराध की श्रेणी में नहीं
जब पड़ोसी बीमार पड़ गई तो पैगंबर उससे मिलने गए। इसके परिणामस्वरूप पड़ोसी ने इस्लाम धर्म अपना लिया। पैगंबर मोहम्मद के इस कार्य से बुराई को अच्छाई से दूर करने का उनका दृढ़ सिद्धांत ध्यान प्रदर्शित होता है। इसलिए यदि इस्लाम का कोई अनुयायी नबी का अपमान करने वाले किसी व्यक्ति का सिर कलम करने का नारा लगाता है तो यह पैगंबर मोहम्मद के आदर्शों का अपमान करने के अलावा और कुछ नहीं है।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि सर तन से जुदा जैसे नारे का उद्भव भारत की सांस्कृतिक, कानूनी या धार्मिक परंपराओं से नहीं जुड़ा है, बल्कि यह पड़ोसी देश के ईशनिंदा कानूनों और वहां हुई हिंसक घटनाओं से प्रभावित है। कोर्ट ने नारा-ए-तकबीर या जय श्री राम जैसे धार्मिक जयकारों और हिंसा को उकसाने वाले नारों के बीच स्पष्ट अंतर करते हुए कहा कि जब तक धार्मिक नारे दुर्भावनापूर्ण तरीके से दूसरों को डराने या हिंसा भड़काने के लिए इस्तेमाल न किए जाएं, तब तक वे अपराध की श्रेणी में नहीं आते। अपराध की गंभीरता, उपलब्ध साक्ष्यों और मामले की परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने आरोपी को किसी भी प्रकार की राहत देने से इन्कार करते हुए जमानत अर्जी खारिज कर दी।