इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि केवल समझौता बिक्री (एग्रीमेंट टू सेल) करने वाला व्यक्ति संपत्ति के बंटवारे के लिए दायर मुकदमे में आवश्यक या उचित पक्षकार नहीं हो सकता। बिक्री समझौता एक कानूनी पंजीकृत दस्तावेज है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि केवल समझौता बिक्री (एग्रीमेंट टू सेल) करने वाला व्यक्ति संपत्ति के बंटवारे के लिए दायर मुकदमे में आवश्यक या उचित पक्षकार नहीं हो सकता। बिक्री समझौता एक कानूनी पंजीकृत दस्तावेज है। इससे संपत्ति में कोई हक या दावा पैदा नहीं होता है। इस टिप्पणी संग न्यायमूर्ति मनीष कुमार निगम की एकल पीठ ने गौतमबुद्ध नगर निवासी दीपेंद्र चौहान की पुनरीक्षण अर्जी पर ट्रायल कोर्ट का फैसला रद्द कर दिया।
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दीपेंद्र ने मां फूल कुमारी व परिवार के अन्य सदस्यों के खिलाफ सेक्टर-39 स्थित संपत्ति में बंटवारे और उसे बेचने से रोकने के लिए मुकदमा दायर किया था। लंबित मुकदमे के दौरान फूल कुमारी ने प्रतिवादी दो लोगों के पक्ष में 12 जुलाई 2023 को संपत्ति का बिक्री समझौता कर दिया। इसके बाद प्रतिवादियों ने स्वयं को मुकदमे में शामिल करने की अर्जी दायर की तो सिविल जज ने स्वीकार कर ली। इस फैसले के खिलाफ दीपेंद्र चौहान ने हाईकोर्ट में पुनरीक्षण अर्जी दायर की।
कोर्ट ने कहा कि संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम की धारा-54 के मुताबिक किसी अचल संपत्ति के बिक्री के समझौते से उस संपत्ति में खरीदार का कोई हक या दावा पैदा नहीं होता। यह सिर्फ एक ऐसा अनुबंध है, जिसके आधार पर खरीदार बिक्री विलेख कराने के लिए मुकदमा कर सकता है। क्योंकि, समझौता बिक्री करने वालों का संपत्ति पर कोई कानूनी हक नहीं बनता। इसलिए वे बंटवारे के इस मुकदमे के आवश्यक या उचित पक्ष नहीं हो सकते।