याची के अधिवक्ता ने दलील दी कि पीड़िता कानूनी तौर पर उसकी विवाहित पत्नी है। अंतरंगता उसका अधिकार है। लिहाजा, आईटी एक्ट के तहत दर्ज मुकदमा रद्द किया जाना चाहिए। कोर्ट ने दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया। कहा कि पत्नी का शरीर उसकी अपनी संपत्ति है। उसके निजी जीवन से जुड़ी हर बात में उसकी सहमति जरूरी है।
विवाह एक पवित्र रिश्ता है। विश्वास उसकी नींव है। खुद को पत्नी का मालिक मान कर फेसबुक पर अंतरंग वीडियो अपलोड कर वैवाहिक रिश्ते की पवित्रता को भंग नहीं किया जा सकता। पत्नी पति से अपेक्षा करती है कि वह उसके समर्पण और भरोसे का सम्मान करे।
कोर्ट ने फैसले में कहा कि एक दौर था, जब विवाह के बाद महिला की कानूनी पहचान पति के अधीन कर दी जाती थी। अब ये धारणाएं सैद्धांतिक रूप से फीकी पड़ गई हैं, लेकिन उनके अवशेष बचे हैं। पत्नी की शारीरिक स्वायत्तता और गोपनीयता का सम्मान करना न केवल पति का कानूनी दायित्व है, बल्कि समानता को बढ़ावा देने की नैतिक अनिवार्यता भी है।