याची ने जांच रिपोर्ट और दावा खारिज करने वाले आदेश को हाईकोर्ट ने चुनौती देते हुए मुआवजा दिलाने की मांग की। विद्युत विभाग के वकील प्रांजल मेहरोत्रा ने याचिका की पोषणीयता पर सवाल खड़ा किया। साथ ही यह भी दलील दी कि मृतक के करंट लगने की घटना के लिए उसे ही जिम्मेदार ठहराया।
जबकि याची के अधिवक्ता मनोज कुमार और सुधाकर यादव ने दलील दी कि यह मामला कठोर दायित्व का है। विद्युत विभाग की लापरवाही के कारण तार खुले थे, जिसके संपर्क में आने पर याची के पति की मौत हुई। इस लिए वह मुआवजा पाने की हकदार है।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए यह माना की यह मामला कठोर दायित्व के सिद्धांत के दायरे में आता है लेकिन मुआवजे के दावों के लिए पीड़ित पक्षकार अनुच्छेद 226 के तहत सीधे हाईकोर्ट का दरवाजा नही खटखटा सकता। इसके लिए उसे नियमानुसार पहले दीवानी की शरण लेनी होगी। कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए याची को परिसीमा अधिनियम का लाभ लेते हुए निर्धारित दीवानी अदालत की में दावा दाखिल करने की स्वतंत्रता प्रदान कर दिया।